Friday, February 12, 2010

नक्सली ककहरा

किसी भी समाज की व्यवस्था पर सबसे अच्छी चोट बच्चों का गलत इस्तेमाल करके पहुंचायी जा सकती है। यही कारण है कि पहले जिन सरकारी स्कूलों के भवन को नक्सलियों ने तोड़ दिया था आज वहीं आदिवासी बच्चे नकसली ककहरा पढ़ रहे हैं। कैसे नक्सली बस्तर जिले के आंतरिक क्षेत्रों में चलने वाले इन प्राथमिक स्कूलों में बच्चों को गणित, विज्ञान व पर्यावरण के साथ हथियारों का प्रशिक्षण और लोगों के साथ विद्रोह की मूल बातें सिखा रहे हैं? प्रस्तुत है इसी की पड़ताल करता यह आलेख- अब नक्सली यह समझ चुके हैं कि सिर्फ आतंक फैला कर वे आदिवासियों को ज्यादा दिनों तक बहका नहीं सकते हैं। उनका विश्वास फिर से हासिल करने का सबसे बेहतर तरीका है उनकी भावनाओं पर चोट करना और उन्हें कमजोर बनाकर अपनी ओर आकर्षित करना। शायद यही कारण है कि पहले जो सरकारी स्कूल नक्सलियों के कोप का शिकार बनकर उजाड़ हो गए थे आज वहीं नक्सली, आदिवासी बच्चों की भर्ती, उनकी शिक्षा का खासा ध्यान रख रहे हैं। खास बात यह है कि इन स्कूलों में बच्चे क, ख, ग, घ.. .. .. का ककहरा सीखने के बजाय नक्सली ककहरा सीखने पर मजबूर हैं। नक्सलियों के इस ककहरे में बच्चों को वही सब सिखाया जाता है जो आगे चलकर उन्हें नक्सली बनाने के लिए जरूरी है। इन प्राथमिक विद्यालयों में भाकपा (माओवादी) द्वारा प्रकाशित दंडकारण्य समिति की पाठ्यपुस्तकों का इस्तेमाल किया जाता है। इन पाठ्यपुस्तकों के विभिन्न अध्यायों में क्षेत्र के भूगोल और स्वास्थ्य के मुद्दों पर अध्याय हैं। साथ ही क्षेत्र में फैलने वाली सामान्य बीमारियों जैसे मलेरिया और पीलिया के बारे में भी जानकारी है। यह सब तो मात्र लोगों को दिखाने के लिए है। इन पुस्तकों का खास मकसद बच्चों में व्यवस्था के खिलाफ ज़हर भरना है। नक्सलियों के इस मकसद का पहला कदम है इस पुस्तक का कवर जिसमें 19 वीं सदी में आदिवासियों द्वारा पर्लकोट विद्रोह में इस्तेमाल किए गए नारे 'आज पढ़े, आज लड़े, जनता को आगे ले जाएंÓ का उपयोग किया गया है। दंडकारण्य समिति की इन पाठ्यपुस्तकों का खुलासा तब हुआ जब पुलिस द्वारा नक्सल विरोधी अभियान के तहत छापे के कार्यवाही के दौरान इन्हें जब्त किया गया। जब्ती की इन कार्यवाहियों में दक्षिण बस्तर से बंदूक भी बरामद हुई हैं। इस बात को पुलिस ने भी स्वीकारा है कि नक्सली इन बंदूकों का इस्तेमाल स्कूलों में उपस्थित बच्चों को, हथियारों का प्रशिक्षण देने के लिए करते थे। क्या कर रही है प्रदेश की भाजपा सरकार पढ़िए अगली बार

2 Comments:

Anonymous said...

wah Neelam wah. bahut khoob.abhi taq suna tha ki naxali mahilaon ko use karte hain per aapke lekh se pata chala ki bachche bhi hathiyar ban chuke hain.Anyway aapki lekhni me gazab ki dhar paida ho gai hai. film lekhan se itar likhna achchha lag raha hai. is gati ko banaye rakhen.

bhart yogi said...

neelam ji dhnyvad aap ne chhttisgarh (aadivasiyo) ka dard samjha.......our unki pida ko likha.....is ki jarurat..chhttisgarh ko..hai ki naksalvadiyo..ki ...kadi se kadi ninda ki jani ..chahiye...

नीलम