Wednesday, August 4, 2010

अपने-अपने जिद्द के शिकार

छह दशक से भी अधिक का समय बीत चुका है। भारत-पाकिस्तान के बीच जितने मुद्दों पर मतभेद थे, वे आज भी बरकरार है। साथ में मुद्दों की संख्या में इजाफा ही हुआ है। लेकिन उसका हल नहीं निकल पा रहा है। महज औपचारिकतावश मंत्री और सचिव स्तर की वार्ताओं का आयोजन तो नियमित अंतराल पर होता रहा है, लेकिन नतीजा वह ढाक के तीन पात।
आखिर क्यों? जबाव मिलता है अमेरिका के रूप में। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब से दक्षिण एशियाई देशों में अमेरिकी की दिलचस्पी बढ़ी है, तभी से यह क्षेत्र पहले से अधिक अशांत हो गया है। यह सर्वविदित ही है कि पाकिस्तान के स्थापना काल से ही अमेरिका उसे प्रश्रय देता रहा है और वहां के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप भी। नतीजन, पाकिस्तान अमेरिकी हाथों कठपुतली बन चुका है। अब, भारत के मामले में भी ऐसा ही कहा जा रहा है। ऐसे आरोप लगने शुरू हो गए हैं कि भारत की विदेश व आर्थिक नीतियां अमेरिका प्रभावित हैं। संसद के अंदर और बाहर विपक्ष ऐसे आरोप लगाता रहा है। सरकार की ओर से पुरजोर खंडन के बावजूद आम जनता आश्वस्त नहीं हो पा रही है।
भाजपा प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी कहते हैं 'अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन कह रही हैं कि अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन और तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर पाकिस्तान में हैं, लेकिन इसके बाद भी वह पाकिस्तान को असैन्य सहायता दे रही हैं। आतंकी संगठनों के साथ पाकिस्तान के संबंध के पुख्ता सबूत के बावजूद अमेरिका भारत और पाकिस्तान के साथ समान व्यवहार कर रहा है।Ó रूडी का यह भी कहना है कि अक्टूबर 2008 में असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करते समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि अमेरिका भारत के साथ काम करेगा। 'अब अमेरिका पाकिस्तान की मदद करने में लगा हुआ है। असैन्य परमाणु दायित्व विधेयक अमेरिका के साथ घनिष्ठ रिश्ता बनाए रखने का संप्रग का एक दूसरा प्रयास है और भाजपा सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध करती है। भाजपा का मानना है कि प्रधानमंत्री ने देश की विदेश नीति को गिरवी रख दी है।
दूसरी ओर, दक्षिण एशियाई देशों के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा का मानना है कि जबसे भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांगलादेश, भूटान यानि दक्षिण एशिया के देशो में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ी है इसी के साथ यहां शांति खत्म हुई है। गौरतलब है कि वर्ष 1997 में पैट्रिक ख्रयूज की एक रिर्पोट आयी जिसमें कहा गया की आने वाले समय में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन होगा। यह रिर्पोट काफी चर्चा में रही। रिर्पोट का कहना था कि एशिया के देश अमेरिका की मिलेटरी को कम आंक रहे हैं और अमेरिका के खिलाफ एक आयडिओलॉजी पनप रही हैं। उसी समय डिफेंस मिनिस्टर डोनाल्ड रम्सफील्ड ने कहा कि यूरोप पर उतना ध्यान देने की जरूरत नहीं है जितना की साऊथ एशिया में।
अमेरिकी की यही नीति दिनानुदिन आगे बढ़ती जा रही है। अमेरिका अब देख रहा है कि पाकिस्तान कमजोर हो चुका है। चीन आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। भारत भी उसी राह पर आगे बढ चला है। ऐसे में भारत के साथ दोस्ती गाढी जाए। साथ ही भारत-पाक के रिश्ते में उलझाव को बरकरार रखा जाए। जिससे पाकिस्तान तो अमेरिकापरस्त है ही भारत भी उसकी ओर मुंह ताकता रहे। इस क्षेत्र में जब दो सिपाही हो जाएंगे तो चीन अमेरिकी का कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मï चेलानी के अनुसार, आम तौर पर किसी भी दो पड़ोसी देशों के बीच नियमित तौर पर राजनयिक बातचीत होनी चाहिए, मगर पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान परमाणु बम की आड़ में लगातार भारत के खिलाफ सरहद पार से दहशतगर्दी को बढ़ावा देते रहे हैं। भारत-पाक वार्ता में कुछ भी सामान्य नहीं। अपनी ही नीतियों से अचानक भारत का यू-टर्न, जिसे उचित ही पाकिस्तान ने भारत की कूटनीति का नरम रुख माना। इससे वहां की सेना और खुफिया एजेंसी उत्साहित हुईं। साथ ही भारत सरकार के रुख में बदलाव केंद्र सरकार की इच्छा के बगैर हुआ, जिस लेकर जनता के सवालों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। असल में भारतीय रुख में बदलाव और प्रधानमंत्री के बयान के बाद सीमा पार से आतंकवादियों घुसपैठ की घटना बढ़ी है। अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी घटाए बिना पाकिस्तान वहां अपना सैन्य और राजनीतिक प्रभाव नहीं बढ़ा सकता। इसके बगैर वह अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की रणनीति 'पैसे लो और आगे बढ़ोÓ को एक तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचा सकता। अफगान समाज के लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष तबकों में भारत मजबूत भूमिका निभा रहा है।
इसके अलावा, भारत के निर्णय को देखकर लगता है जैसे वह अमेरिका की अफ-पाक रणनीति की सहायता के लिए लिया गया हो। अमेरिका ने अफगान तालिबान से तालमेल बढ़ाने के सार्वजनिक संकेत देकर यह स्पष्ट किया है कि उसकी पाक सेना और खुफिया तंत्र पर निर्भरता बढ़ी है। अफगान तालिबान के साथ कामयाब बातचीत के लिए अमेरिका सबसे पहले तालिबान को कमजोर करना चाहता है। इसीलिए अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान के मारजाह में चल रही कार्रवाई में आक्रामकता दिख रही है। चूंकि अमेरिका अफगान तालिबान के कमांडरों पर दबाव बनाने और उन्हें वार्ता की मेज पर लाने के लिए पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसियों से सहायता की उम्मीद कर रहा है इसलिए उसने पाकिस्तान को खुश करने के लिए भारत को इस्लामाबाद के साथ वार्ता की मेज पर आने का मशविरा दिया। दुश्मन के साथ बेहतर राजनीतिक सौदेबाजी के लिए अमेरिका की यह शुरू से रणनीति रही है कि पहले दबाव बनाओ फिर बातचीत करो।
चिंता की खास वजह यह भी है पाकिस्तान की मौजूदा हालात का लाभ उठाने की जगह भारत अमेरिका का सहारा ले रहा है। भारत अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के प्रयोग के प्रति भी अनिच्छुक है। पाकिस्तान के साथ वार्ता शुरू करने से पता चलता है कि वह अपने कूटनीतिक दांव का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहता। पाकिस्तान के विरुद्ध भारत न सिर्फ कूटनीतिक कवायद से बच रहा है, बल्कि नतीजे के लिए बाहरी ताकतों की ओर देख रहा है। इनमें अमेरिका से लेकर सऊदी अरब तक शामिल हैं। बाहरी ताकतों के भरोसे रहना भारत के लिए जोखिम भरा रहा है। जहां तक अमेरिका की दक्षिण एशिया संबंधी नीति का सवाल है तो वह शुरू से ही संकीर्ण रही है।
पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रह चुके जी. पार्थसारथी फरमाते हैं कि जब तक दोनों देश के विदेशमंत्री अथवा सचिव यह मिलकर तय नहीं कर लेते कि सारे द्विपक्षीय मुद्दों पर मतभेद कहां हैं, तब तक कोई भी वार्ता सफल नहीं हो सकती। आपसी असहमति की पहचान करके भरोसे की तलाश की जा सकती है। सीधे भरोसा खोजने जाएंगे तो नाउम्मीदी ही हाथ लगेगी। और जाहिरतौर पर इसका लाभ कोई तीसरा देश लेगा।
यह तीसरा देश कोई और नहीं बल्कि अमेरिका है। जो अपने सामरिक और आर्थिक हितों से वशीभूत होकर भारत-पाक संबंधों में दिलचस्पी ले रहा है। जिस प्रकार से बीते दिनों अमेरिकी राष्टï्रपति बाराक ओबामा ने भारत-पाक संबंधों को सुधारने का ठेका चीन को देने का ऐलान किया , यह सीधे-सीधे भारतीय सार्वभोमिकता में दखल है। जानकार मानते हैं कि बाराक ओबामा की भारत पर दादागिरी की हिम्मत एटमी करार के कारण ही पैदा हुई है। यह अधिकार तो संयुक्त राष्ट्र को भी नहीं है कि वह बिना हमारी सहमति के किसी तीसरे देश को बिचौला बनने का अधिकार दे। जिस भारतीय कश्मीर का एक हिस्सा चीन ने हड़प रखा है, उस कश्मीर का विवाद निपटाने के लिए चीन को कहना निश्चित रूप से अमेरिका का भारत विरोधी कदम है। हाल ही में चीन की ओर से कश्मीरी नागरिकों को भारतीय पासपोर्ट की बजाए सादे कागज पर वीजा दिया जाना और अब चीन का कश्मीर में मध्यस्थ बनने की कोशिश भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय साजिश की ओर इशारा करते हैं।

1 Comment:

yograj sharma said...

अच्छा लेख... मन से लिखा गया... सच्चाइयां उजागर करता हुआ...
साधूवाद
योगराज शर्मा
एडिटर इन चीफ
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नीलम