Tuesday, March 2, 2010

ऐसा भी क्या लिखना?

तस्लीमा नसरीन अच्छा लिखती हैं और उनके पर पर मेरी अच्छी या बुरी टिप्पणी का कई फर्क नहीं पड़ता है पर पिछले रविवार उनके लेख की प्रतिक्रिया के चलते जो भी हुआ वह मुझे नागवार हैं। एक खबर के अनुसार कर्नाटक के एक कन्नड़ अख़बार में रविवार को बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन एक लेख के विरोध करने के लिए करीब 1500 लोग सडक़ों पर उतर आए। इस लेख में कुछ ऐसी बाते हैं जिससे एक समुदाय विशेष के आहत हुए। ये जुलूस उस समय हिंसक हो गया जब लोगों ने गाडिय़ों पर पत्थर फेकने शुरू कर दिए। करीब 20 वाहनों को नुक्सान पहुँचाने पर पुलिस ने स्थिति पर काबू पाने के लिए गोलियां चलाई, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। माना क़ि तसलीमा जी की लेखनी की तारीफ हर जगह होती है और उनकी रचना पुरस्कृत भी होती रहती हैं पर ऐसा भी क्या लिखना क़ि किसी की जान पर बन आए। माना क़ि कट्टरता के खिलाफ आवाज बुलंद करना जरूरी है पर उस आवाज़ में इतनी तल्खी ना हो कि इन्सानिय ही कहीं खो जाए। ऐसे लिखने से तो ना लिखना ही बेहतर है। क्या आप मुझसे सहमत हैं?

2 Comments:

इंडिया उवाच said...

ye hindustan hai...aur yahan ke log swabhav se sahanshil mane jate hain....tabhi to kabhi Maqbool fida hussain aur kabhi Taslima nasreen bakhera khara karti hain...isi boudhik diwalayipan v kah sakte hain...

सुभाष चन्द्र said...

aapne jo mudda uthaya hai...us se bina sahmat hue rah nahi sakta........

नीलम