Saturday, May 15, 2010

कुर्सी के लिए कुछ भी करेगा

लोकतंत्र में जब बहुमत किसी भी दल को नहीं मिलता है और गठबंधन की राजनीति में स्वार्थ टकराता है तो स्थिति कैसी विचित्र हो सकती है, उसका नायाब नमूमा झारखंड से बेहतर मुश्किल है। पिछले एक पखवाड़ें से भी अधिक समय से कभी समर्थन तो कभी समर्थन वापसी को लेकर जिस प्रकार के सियासी दांव चले जा रहे हैं, उसके आधार पर तो यही कहा जा सकता है कि प्रदेश के राजनेता का ध्येय लोककल्याणकारी सरकार का गठन करना नहीं बल्कि अपने लिए एक अदद कुर्सी का इंतजाम भर करना रह गया है।
खबर लिखे जाने तक प्रदेश के राजनीतिक हालात बताते हैं कि सरकार भाजपा-झामुमो गठबंधन की होगी। कई दौर की बैठकों के बाद दोनों दलों ने 50-50 का फार्मूला तो तय कर लिया, लेकिन पहले कौन? इस पर सहमति बननी बाकी है। भाजपा की ओर से कहा जाने लगा कि पहला मुख्यमंत्री उसका और विधानसभा अध्यक्ष झामुमो का। लेकिन, झामुमो की ओर से मांग की गई कि पहले दौर की मुख्यमंत्री हमारा हो। दरअसल, शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा सत्ता के लालच में फंस गई है। उसने झारखंड में नई सरकार बनाने के लिए अब भाजपा के सामने नई शर्त रख दी है। हर दिन नए पैंतरे आजमाने वाली जेएमएम अब सत्ता में पहले भागीदारी चाहती है। झामुमो की मांग है कि रोटेशन के तहत झारखंड में पहले झामुमो का मुख्यमंत्री हो, जबकि भाजपा पहले अपना सीएम चाहती है। अगर भाजपा का सीएम हो तो, झामुमो का स्पीकर हो। भाजपा को झामुमो को सीएम और स्पीकर दोनों पद देना मंजूर नहीं है। सो, गतिरोध कायम है।
मुख्यमंत्री के नाम पर भी पार्टी में सहमति बन गई है। 28-28 माह सरकार चलाने के जबकि भाजपा खेमे में झामुमो के प्रस्ताव पर भी पार्टी में आम राय बना ली गई है। मुख्यमंत्री के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, रघुवर दास व नीलकंठ सिंह मुंडा के नाम पर विचार किया गया है। भाजपा की ओर से आदिवासी होने के नाते अर्जुन मुंडा प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं, कारण उन्हें सरकार चलाने का अनुभव भी है और आदिवासी वर्ग से आते हैं। लेकिन झामुमो की ओर से कौन होगा, स्वयं शिबू सोरेन भी पक्के तौर पर नहीं कह पा रहे हैं।
अब सवाल यह भी उठता है कि आखिर क्यों हुआ झारखंड में सियासी झमेला ? यह संकट उस वक्त शुरू हुआ, जब भाजपा ने 28 अप्रैल को झामुमो से समर्थन वापस लेने का फैसला किया। हालांकि, इस फैसले को रोककर रखा गया था। इसके एक दिन पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री और सांसद शिबू सोरेन ने लोकसभा में भाजपा की ओर से लाए गए कटौती प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया था। प्रत्यक्ष तौर पर आम जनता यही कह रही है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस रणनीतिकार लगातार एक-एक पल पर नजर गड़ाए हुए हैं। सूत्रों के हवाले से यह कयासबाजी भी की जा रही है कि सुबोधकांत सहाय मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब संजोए हुए हैं। कहा जा रहा है कि इसी रणनीति के तहत शिबू सोरेन से जुड़े तमाम पुराने मामलों के फाइल खंगाले जा रहे हैं। संभवत: इसी वजह से झामुमो को लगातार अपने बयान बदलने को मजबूर होना पड़ रहा है।
गौर करने योग्य यह भी है कि झारखंड के 82 सदस्यीय विधानसभा में इस नए गठबंधन के 45 सदस्य हैं। झामुमो और भाजपा के 18-18 विधायक हैं, आजसू के पांच और जदयू के दो विधायक हैं। इनके साथ दो निर्दलीय विधायक भी हैं। बहरहाल, यह भी खबर है कि झामुमो के कुछ विधायक इस नए समझौते से खुश नहीं हैं लेकिन पार्टी नेतृत्व को विश्वास है कि वह उन्हें मना लेगी।
चूंकि यह प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों से लैस है। सो, प्रदेश में कार्यरत खनन माफिया भी अपने-अपने समर्थकों के बल पर सरकार गठन की प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं। आखिर, व्यापारियों को सरकार से पचासों काम कराने को होते हैं। तभी तो सियासी हलको में यह खबर उठने लगी है कि झारखंड का झमेला सुलझाने में राजनीतिक दल नाकाम हो चुकी है और अब खान माफिया यह तय करने में अपनी पूरी ताकत लगा रहा है कि अपने हित सुरक्षित करने के लिए वह किसकी सरकार बनाने में मदद करे। ऐसी स्थिति में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में सरकार झामुमो-भाजपा गठबंधन की बनें अथवा झामुमो-कांग्रेस गुट का, पैसे का बोलबाला होगा। विधायकों की खरीद-फरोख्त एक बार फिर होगी। ऐसे में इस सच को भी नहीं झुठलाया जा सकता है कि जो व्यापारी वर्ग सरकार बनाने में मदद करेगा, वह किसी प्रकार का अनैतिक आर्थिक लाभ नहीं उठाएगा। ऐसे में अपने गठन के नौ वर्ष बाद भी स्थायीत्व की बाट जोहता प्रदेश लूट-खसोट का नया केंद्र बनकर उभरेगा।
पुत्रमोह में शिबू हुए फेल
राजनीति में वंशवाद की बात करने वाले हरेक नेता अपने पुत्रों को अपेक्षित मुकाम दिलाने में पास रहे हैं, लेकिन झारखंंड के वर्तमान मुख्यमंत्री शिबू सोरेन अपने पुत्रमोह के कारण बार-बार फेल होते जा रहे हैं। हालिया झमेला भी उसी की परिणति है। बड़े भाई दुर्गा सोरेन के असमय गुजर जाने के बाद हेमंत सोरेन की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ती गई। इस बार उसे लगने लगा कि वह अपने पिता का राजनीतिक वारिस है और प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री भी। इस महत्वाकांक्षा को कुछ विधायकों ने हवा भी दे डाली। सो, हेमंत ने झामुमो कार्यकारिणी की बैठक बुलाई, साथ ही पार्टी के थिंक टैंकरों को भी। लेकिन, ऐन मौके पर कटौती प्रस्ताव के दौरान गुरूजी के मतदान ने सारा समीकरण ही बिगाड़ कर रख दिया। पुत्रमोह के कारण ही भाजपा के साथ फिर से साझेदारी करने की बात के बावजूद भी किसी ठोस पड़ाव पर नहीं पहुंच चुके हैं।

Saturday, May 1, 2010

जागो भारत जागो

अब वह दिन दूर नहीं जब भारतीय रसोई के जान पहचाने व्यंजनों को खान से पहले हमें अमेरिका या पाकिस्तान की इजाजत लेनी पड़ेगी। इसे पेटेंट कानून का दुरुपयोग कहें या सदुपयोग कि आज हर व्यंजन पर कोी न कोी व्यक्ति या देश कब्जा करना चाहता है। कुछ साल पहले दक्षिण भारत के एक प्रमुख होटल ने इडली वड़ा, मसाला डोसा आदि पर पेटेंट प्राप्त किया था। चूंकि एक देश को दिए गए पेटेंट किसी अन्य देश को नहीं दिए जा सकते, इसलिए इडली वड़ा, मसाला डोसा और ऐसे ही दूसरे व्यंजन किसी अन्य देश के पेटेंट कब्जे में नहीं जा सकते। यह सुखद व सराहनीय काम रहा। साथ ही यह उस भारतीय होटल का एक बुद्धिमानी भरा कदम था। अगर अपने देश के व्यंजनों को बचाना है तो अन्य भारतीयों को भी इसका अनुकरण करना चाहिए। वैसे भी हमारे तमाम चीजों पर लोगों की नज़र है। परंपरागत व्यंजनों के मामले में भी, आप संभवत: पहले ही यह सुन चुके होंगे कि जापान ने भारतीय मसालों के पेटेंट हासिल करने के लिए कैसे-कैसे प्रयास किए। नेस्ले ने पहले ही वेज पुलाव का पेटेंट हासिल कर लिया है। इसी दौरान ब्रिटिश शहर बर्मिंघम ने बाल्टी व्यंजनों पर यूरोपीय संरक्षण पाने का आवेदन किया है। इसी तरह पाकिस्तान में जन्मे ब्रिटिश सांसद मोहम्मद सरवर मसालेदार चिकन टिक्का पर पेटेंट हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका दावा है कि इसका आविष्कार स्काटलैंड के शहर ग्लासगो में 1970 में हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश संसद के निचले सदन में प्रस्ताव पेश किया है और यूरोपीय संघ से समर्थन की मांग की है कि ग्लासगो को इस व्यंजन के आविष्कार का मूल अधिकार देने में सहयोग करे। फिलहाल आशा तो यही है कि भारत को चिकन टिक्का पर स्काटिश दावे के खिलाफ वैसी लड़ाई नहीं लडऩी पड़ेगी, जैसी उसे हल्दी पर हक हासिल करने के लिए लडऩी पड़ी। यह ज्यादा चिंता करने वाली बात नहीं है। वास्तव में बड़ा मसला और चिंता का विषय परंपरागत भोजन और व्यंजनों तथा अन्य तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों पर एकाधिकार नियंत्रण के वैश्विक प्रयासों को लेकर किए जा प्रयासों की है। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की आम सभा में भी पेटेंट कानून को सुगम बनाने पर चर्चा हुई। पेटेंट सहयोग संधि के नाम पर डब्लूआईपीओ जो प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है, वह अगर पारित हो गया तो यह सुनिश्चित हो जाएगा कि जिस पेटेंट को तीन देशों द्वारा स्वीकृति प्रदान कर दी जाएगी, वह अंतरराष्ट्रीय पेटेंट के रूप मान्य हो जाएगा। डब्लूआईपीओ जो प्रयास कर रहा है उसका मतलब है दुनिया में एकल पेटेंट कानून लागू करना। ऐसे में पेटेंट राष्ट्रीय संपदा नहीं रह जाएगा। दूसरे शब्दों में, इसका मतलब होगा कि विकासशील देश पेटेंट के लिए मानदंड निर्धारित नहीं कर पाएंगे। नई व्यवस्था के तहत दुनिया में किसी भी तीन स्थानों पर मौजूद पेटेंट कार्यालय की परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर पेटेंट दे दिया जाएगा। इस रिपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय पेटेंट की मान्यता के तौर पर स्वीकार किया जाएगा। यहां यह स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि वैश्विक पेटेंट का दायरा केवल चिकन टिक्का और बाल्टी तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विकास की तमाम गतिविधियों तक इसका विस्तार रहेगा। हम देश के आर्थिक विकास में इन पेटेंट की अहमियत नहीं समझ रहे हैं। कोई भी यह देख सकता है कि परंपरागत पाककला और ज्ञान पर एकाधिकार पाने के लिए विश्वव्यापी दिलचस्पी प्रदर्शित की जा रही है। केवल तकनीकी श्रेष्ठता ही नहीं, बल्कि हमारा परंपरागत ज्ञान और उत्पाद विकसित देशों के हाथों में जा रहे हैं। खैर यह कोई बड़ा मसला नहीं है। यह प्रस्ताव विकासशील देशों के लिए बहुत घातक है। यह विकासशील देशों को वैज्ञानिक उपलब्धियों से वंचित करने का हथियार बन जाएगा और वैज्ञानिक शोध तथा प्रौद्योगिकी विकास पर विकसित व औद्योगिक देशों का कब्जा हो जाएगा। विकासशील देश इन देशों के लिए काम करने का केंद्र बनकर रह जाएंगे। गौर से देखें तो पेटेंट का यह पूरा खेल भद्दे स्तर तक पहुंच गया है। वैश्विक पेटेंट जल्द ही अंतरराष्ट्रीय मानक बन जाएंगे, मगर फिर भी हैरानी की बात है कि अब भी इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बहस नहीं छिड़ी है। वैसे भी भारत में पेटेंट कभी भी राजनीतिक मुद्दा नहीं बनता है। पूर्व के उन उदाहरणों से भी हम आंखें फेर रहे हैं जिनमें विशुद्ध भारतीय नीम और हल्दी का पेटेंट कराने के प्रयास किए गए थे। इसके अलावा कई अन्य भारतीय व्यंजनों और खाद्यान्नों को भी एकाधिकार नियंत्रण का लक्ष्य बनाया जा चुका है। अब समय आ गया है, जब हमें विकसित देशों को उनके ही खेल में मात देनी चाहिए। भारत को पेटेंट के खतरों के प्रति सचेत होना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय को वाणिज्य मंत्रालय के सहयोग से लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने तथा भारतीयों को अपनी परंपरागत कला पर पेटेंट हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करने का अभियान छेडऩा चाहिए।

जलती चुभती गर्मी

गर्मी ने सबको हैरान परेशां कर रखा है चाहे जानवर हो या इंसान प्यास बुझाने के नए नए तरीके अजमाते रहते है और हा ठंडी चीज़े इन्हें भी भाती है आखिर कहा मिलेगा थोडा सुकून

नीलम