Friday, January 22, 2010

मुद्दे हैं बेशुमार, विपक्ष है बीमार

अमूमन भारत में चुनावों के शंखनाद के साथ ही दलों के पास अपने अपने मुद्दे होते जाते हैं। उन्हीं मुद्दों के सहारे जनता का ध्यान अपनी ओर आकृष्टï करने की भरसक कोशिश की जाती है। सत्ता में आने के बाद उसका पालन किया जाए अथवा नहीं, यह अलग विषय हो जाता है। तभी तो गत आम चुनाव में महंगाई, बेरोजगार, सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों को बड़े जोरशोर से उठाया गया और करीब छह महीने बीतने के बाद उस पर चर्चा नहीं के बराबर होती है।
जमीनी हकीकत यह है कि महंगाई क्रमानगुत तरीके से बढ़ रही है, नए रोजगारों का सृजन नहीं हो पा रहा है और सरकार प्रोपगण्डा कर रही है कि मंदी समाप्ति की ओर है और हम विकास कर रहे हैं। हैरत तो तब होती है जब संसद में बजट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर सार्थक विपक्ष के अभाव में समुचित बहस-मुहाबिसे नहीं हो पाती है। ऐसा भी नहीं है कि सत्तारूढ़ दल तीन-चौथाई वाली बहुमत के साथ सदन में अपनी धाक रखता है। बल्कि विपक्ष में एका का अभाव है। भाजपा हो या वामदल - अपने घर को ही दुरूस्त करने में लगे हुए हैं। राजद और सपा-बसपा सरीखें दलों की स्थिति इस आमचुनाव में निर्णायक रही नहीं है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई मुद्दा है भी? क्या ऐसा तो नहीं कि ये एक मुद्दा विहीन समाज होता जा रहा है। क्या ये ऐसे मुद्दे हैं जिनसे जनता को कोई सीधा सरोकार है। इस हिसाब से देखा जाए तो उसके लिए तो हमेशा से अपनी रोज़ी रोटी की फि़क्र और सामाजिक सुरक्षा ही बड़े मुद्दे हैं। और इन्ही मुद्दों के भीतर आते हैं जाति और क्षेत्र और स्थानीय अपेक्षाओं से जुड़े मुद्दे मसलन बिजली पानी सड़क। महंगाई जैसे चिर परिचित या यू कहें सनातन मुद्दे। अतीत के कड़वे अनुभव इस बात के गवाह हैं कि चुनावी घोषणापत्रों के महा अंबार के बीच और सरकारों की अपार आवाजाही के बीच ये मुद्दे तो जैसे सख्त चट्टान की तरह वहीं पड़े हैं। ये हिलते नहीं और नेता गण जब वोट मांगने जाते हैं तो इन मुद्दो का ख़ास ख्याल रखते हैं। ऐसा भी नहीं है कि बिजली पानी सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकारें काम भी करती हैं लेकिन ये इतना बिखरा हुआ और बहुत सारा है कि हर बार इनकी कमी का रोना रहता ही है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, मंहगी होती उपभोक्ता सामग्री और खाद्यान्न। महंगाई की दर आंकड़ों के हिसाब से तो दुरुस्त है लेकिन आम आदमी की जेब तो तेज़ी से खाली हो ही रही है।
दरअसल, भूमडंलीय मंदी के इस दौर में भी भारत की अर्थव्यवस्था गतिशील है। इसके बावजूद सात दशमलव एक फीसदी की विकास दर पिछले छह साल में सबसे कम है। निर्यात में कमी आयी है। लेकिन क्या इस मुद्दे से उन लाखों किसान परिवारों का कुछ लेना देना है जहां तक सरकार की आर्थिक मदद गयी है। गौर करने योग्य यह भी है कि भारत में आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि इस देश के वामपंथी तथा विपक्षी दलों के व्यापक विरोध का कारण बनी है। विपक्ष के सांसदों ने मूल्यों में सात दश्मलव चार एक प्रतिशत की वृद्धि को यूपीए सरकार की अक्षमता का कारण बताया है। विपक्षी सांसदों ने कल लोकसभा तथा राज्यसभा का बहिष्कार किया। विपक्षी तथा वामपंथी दल आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि को अभूतपूर्व मान रहे हैं। भारत में लोकसभा के चुनावों का समय निकट आने के साथ ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की नीतियों तथा क्रियाकलापों की आलोचना में बढ़ोत्तरी हो रही है। यह दल हाल ही में भारत तथा अमरीका के बीच परमाणु सहयोग समझौते की आलोचना करते हुए इस समझौते के बारे में कांग्रेस को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। यही विषय इस बात का कारण बना है कि भारत की केन्द्र सरकार अमरीका के साथ परमाणु सहयोग समझौते कें संबन्ध में बड़ी सावधानी से कार्य ले। इसी सावधानी ने समझौते के व्यावहारिक होने को असमंजस में डाल दिया है। वर्तमान समय में भारत के विपक्षी दल इस बात के प्रयास मे व्यस्त हैं कि आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में तेज़ी से वृद्धि के विषय से, जिससे मध्यम तथा निचले वर्ग के लोग बहुत अधिक आर्थिक दबाव में हैं, सरकार की आर्थिक नीतियों पर प्रश्न चिन्ह लगाकर आम जनमत को अपने ओर आक्रष्ट करें। भारत के प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि पर प्रतिक्रिया स्वरुप कहा है कि मंहगाई पर नियंत्रण उनकी सरकार के कार्यक्रमों में प्राथमिक्ता पर है। भारत के कुछ आर्थिक हल्क़ों का यह मानना है कि देश में खाद्य पदार्थों के मूल्यों में वृद्धि का संबन्ध सरकार की आर्थिक नीतियों से कम बल्कि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों के बढ़ते मूल्यों से है। इन हल्क़ों के अनुसार यह प्रक्रिया अभी भी जारी है जो विश्व स्तर पर गंभीर चिंता का कारण बनी हुई है। यह आर्थिक हल्क़े पिछले दो वर्षों के दौरान राजग सरकार की आर्थिक नीतियों पर विपक्ष तथा वामपंभी दलों की ओर से विरोध न करने को अपने तर्क की पुष्टि में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि डाक्टर मनमोहन सिंह ने इस दौरान मूल्यों में वृद्धि पर नियंत्रण रखा है। इसी आधार पर भारत सरकार से निकट का संबन्ध रखने वाले आर्थिक हल्क़े, मंहगाई के विषय पर विपक्ष द्वारा हो हल्ला मचाए जाने को उनके द्वारा आर्थिक विषय से राजनैतिक लाभ उठाने के परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं। क्योंकि वामपंथी दलों तथा विपक्ष के दृष्टिकोण अलग अलग हैं इसी आधार पर कहा जा सकता है कि लोक सभा तथा राज्य सभा में इन दलों से संबन्धित सांसद विदित रुप से समन्वित कार्यवाही के अन्तर्गत व्यापक स्तर पर यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों का विरोध कर रहे हैं।
सच तो यह भी है कि ऐन चुनाव से पहले राजनैतिक दल अपने मुद्दे भी जनता के बीच उछालते हैं। सभी राजनैतिक दल अपने मुद्दे बनाते हैं। और उन्हें ऐसे पेश करने की कोशिश करते हैं कि मतदाता का सबसे बड़ा सरोकार तो वही है। लेकिन भारत में मतदाता बहुत रोचक ढंग से और बहुत सोच समझकर वोट करता है। यह भी कहा जा रहा है कि हमारे देश में लोकतंत्र परिपक्व हुआ ही नहीं है, ऐसा लगता है। विपक्ष में चाहे कोंग्रेस हो या भाजपा, वजह बेवजह एक दुसरे को नाहक ही कोसना उन्हें विपक्ष का धर्म लगता है। कुछ दिन पूर्व जब अमेरिकी संसद में राष्टï्रपति बुश का सम्बोधन चल रहा था तो उनके भाषण के दौरान अनेकों बार डेमोक्रेटिक सांसद भी खडे होकर तालीयाँ बजाते दिखे। हमारी संसद में तो ऐसे दृश्य की कल्पना भी नहीं कि जा सकती। अगर मनमोहनसिंह बोलेंगे तो सिर्फ कोंग्रेसी ही मेज पीटेंगे, और अडवाणी बोलेंगे तो भाजपा वाले। यहाँ तक कि राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर भी एकता नहीं दिखाते। चाहे वो पोटा हो या परमाणु सन्धि। क्या पक्ष और विपक्ष में रहने का मतलब सिर्फ एक दुसरे के खिलाफ तलवारे भांजना होता है। हमारे यहाँ तो नेता बनते ही चेहरा छत की तरफ घुम जाता है, नजरें इतनी उँची चढ जाती है कि नीचे खड़ा आम आदमी तो दिखता ही नहीं! सरकार तो बस कभी मेरा भारत महान कहते हैं कभी अतुल्य भारत! हम अपने लोकतंत्र और संस्कृति का बखान करते थकते नहीं हैं, पर क्या हम कभी अपनी गिरहबान में झांककर देखते हैं?

1 Comment:

Journalist Today Network said...

बहुत अच्छा.....

नीलम