Thursday, July 23, 2015

निशाने पर कौन

इन दिनों लगातार एक खास वर्ग के बीजेपी नेता चर्चा में बने हुए हैं। ललित मोदी के नाम साथ पहले सुषमा स्वराज, फिर वसुंधरा राजे और फिर न जाने किस किस का नाम जोड़ा गया पर इस मामले में हकीकत से ज्यादा फसाने हैं। दूसरी ओर पकंजा से लेकर शिवराज तक और रमन से लेकर गडकरी तक किसी न किसी मामले में फंसते दिख रहे हैं। कहीं इसका कारण वह राजनीति तो नहीं जिसके बूते हर बार की तरह नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी नाकामियों का ठींकरा दूसरों के सर फोड़ देते हैं। कहीं आगामी चुनाव में होने वाले हार की फनक तो नहीं लग गई मोदी-शाह जिसके लिए माहौल अभी से तैयार किया जा रहा है।

पूर्व आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी की चर्चा चहुं ओर है। मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी मोदी आईपीएल का कॉन्सेप्ट लाने के साथ-साथ कई वजहों से सुर्खियों में रहे हैं। कांग्रेस से लेकर बीजेपी और बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक उनकी अच्छी पैठ है। फिलहाल भले कांग्रेस उनका नाम वसुंधरा राजे, सुषमा स्वराज और दूसरे भाजपाई नेताओं से जोड़ रही हो पर ललित मोदी की माने तो उनके समर्थक हर दल में। भारतीय जनता पार्टी, केन्द्र या राज्य सरकारों के अंदर जो विभिन्न प्रकार के कथित घोटाले और अनियमित्ताओं के चर्चे हो रहे हैं, इसमें सत्यता चाहे जितनी हो, लेकिन प्रचार के पीछे भाजपा की आंतरिक लड़ाई को भी एक पक्ष माना जा सकता है। गौर से देखेंगे तो ये मामले उन्ही लोगों के खिलाफ उठ रहे हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं बिहार में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं, जो स्थिति बन रही है उसमें बिहार चुनाव भाजपा के लिए बेहद कठिन चुनाव में से एक है।
सबसे पहले ललित गेट की शिकार बनी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज। यदि पूरी भाजपा में देखा जाए तो स्वराज, मोदी की प्रबल विरोधी रही हैं। प्रधानमंत्री बनने से पहले तक स्वराज ने मोदी का जमकर विरोध किया, आज वो भी ललित मोदी प्रकरण वाले मामले में फंसती हुई बताई जा रही हैं। वसुंधरा राजे में कुछ भाजपाइयों को नरेन्द्र मोदी वाला गुण दिखा और उनकी ओर जैसे ही कुछ लोगों का झुकाव हुआ राजे भी टारगेट में आ गई। इस मामले में कांग्रेस सडक़ पर उतरी तो वसुंधरा को घेरने के लिए कुछ दस्तावेज़ पेश किए। 1954 से 2010 तक के सरकारी रिकॉर्ड को दिखा कांग्रेस ने दावा किया कि धौलपुर पैलेस सरकारी सम्पत्ति है और आरोप लगाया कि वसुंधरा राजे ने इस पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से क़ब्ज़ा कर रखा है। ये भी आरोप लगाया कि राजे के बेटे दुष्यंत की कंपनी नियंता होटल हेरिटेज प्राइवेट लिमिटेड में राजे के साथ-साथ ललित मोदी की कंपनी आनंदा का भी शेयर है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश का आरोप है कि राजे-भगोड़ा मोदी के बीच कारोबारी रिश्ते हैं। कांग्रेस ने ललित मोदी पर मारीशस की एक फर्जी कंपनी के जरिये मनी लांड्रिंग का आरोप भी लगाया जिसे दुष्यंत की कंपनी में लगाया गया। जयराम रमेश का आरोप है कि इसके जरिए 22 करोड़ आया जिसमें 11 करोड़ नियंता में लगा। धौलपुर पैलेस की मिल्कियत का, लेकिन विवाद रहा है और मामला कोर्ट तक में गया। दुष्यंत के वकील का दावा है कि धौलपुर हाउस उन्हीं के नाम है। बीजेपी ने भी कांग्रेस के आरोप को बेबुनियाद बताया। इसके बाद यह भी तथ्य सामने आया कि ललित मोदी को पद्म पुरस्कार देने की सिफारिश के मामले में राजस्थान कांग्रेस ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को घेरा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने कहा कि इससे जाहिर होता है कि वसुंधरा राजे और ललित मोदी के घनिष्ठ संबंध रहे हैं। राजे के पूर्व शासन के दौरान 2007 में ललित मोदी को पद्म पुरस्कार देने की सिफारिश करने का मामला उजागर होने के बाद भाजपा एक बार फिर बचाव की मुद्रा में आ गई है। भाजपा के पूर्व शासन के दौरान भ्रष्टाचार को संस्थागत किया गया था और परदे के पीछे से सरकार के कामों में भ्रष्टाचार को पनपाने में सबसे बड़ी भूमिका ललित मोदी की थी। राजे के खिलाफ उजागर हुए मामलों के बाद भी भाजपा नेतृत्व कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। इससे ही साफ होता है कि राजे के पूर्व शासन के दौरान जितनी भी गड़बडिय़ां हुई थीं उसमें भाजपा नेतृत्व और संगठन की सहमति रही है। ललित मोदी के लिए पद्म पुरस्कार की सिफारिश करना राष्ट्रीय पुरस्कार का अपमान है। ललित मोदी प्रकरण के कारण आरोपों से घिरी मुख्यमंत्री राजे अब इस विवाद में फिर उलझ गई हैं। इस मामले में प्रदेश भाजपा की तरफ से कोई सफाई अभी तक नहीं दी गई है। राजे के पूर्व शासन के दौरान खेल परिषद के जरिए 28 जुलाई 2007 को ललित मोदी के लिए पद्म पुरस्कार के लिए सिफारिश की गई थी। सरकार के निर्देश पर खेल परिषद ने ललित मोदी से आवेदन मंगवाया गया था। पद्म पुरस्कार के लिए ललित मोदी के व्यापार और क्रिकेट के खेल को आधार बनाया गया था।
इन सब का जवाब दिया समस्याओं से घिरे और घोटालों के आरोपी आईपीएल के पूर्व प्रमुख ललित मोदी ने अपने विरोधियों के खिलाफ युद्ध की घोषणा करते हुए सनसनीखेज खुलासों की चेतावनी दी है कि अब चीजों को बाहर लाने की उनकी बारी है। पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों का नाम लेते हुए मोदी ने अपने कई ट्वीट में दावे किए कि खुलासे बम का गोला साबित होंगे और इसके लपेटे में पूर्ववर्ती पीएमओ भी आएगा। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा कि अब तथ्यों को सामने रखने का वक्त आ गया है। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, दूसरे खूबसूरत जगह के लिए दूसरे विमान पर सवार होने से पहले यह युद्ध है। मैं युद्ध जीतने के लिए एक लड़ाई हारने को चुना है। सुषमा स्वराज के इस्तीफे के लिए विपक्ष की मांग का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, गलत लोगों के इस्तीफे की मांग की जा रही है। मैं आपको आश्वस्त करना चाहूंगा कि तूफान आने वाला है।
खैर ललित की बात को दरकिनार करके सोचते हैं। ऐसा लगता है कि भाजपा के लिए या भाजपा का यह संघर्ष आने वाले दिनों में और बढ़ेगा। इन दिनों भाजपा के अंदर भौतिक द्वन्द्व भी चल रहा है, जो चरम की ओर बढ़ेगा क्योंकि जहां सबसे ज्यादा व्यक्ति अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है, वही वह सबसे ज्यादा असुरक्षित भी होता है। फिलहाल भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को संभवत: भरोसा हो गया है कि बिहार का चुनाव वे हार भी सकते हैं। यदि बिहार के चुनाव में भाजपा की हार हुई तो उसे सीधे प्रधानमंत्री की कार्यशैली और अध्यक्ष के सांगठनिक कौशल से जोडक़र देखा जाने वाला था, लेकिन उससे पहले ही घोटालों और अनियमित्ताओं का प्रचार प्रारंभ हो गया है। निश्चित ही यह भी संभव है कि बिहार चुनाव में भाजपा हार जाए। या परिणाम दिल्ली जैसे हों। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को बचाने वाली कॉरपोरेट मीडिया भाजपा के नेताओं के ऊपर लग रहे दाग को व्यापक तरीके से प्रचारित कर रही है क्योंकि यदि बिहार चुनाव में भाजपा की हार हुई, तो उसका ठीकरा कथित घोटालेबाज और अनियमित्ता करने वालों पर फोड़ा जा सके। हां, एक बात और है कि मोदी समर्थक कॉरपोरेट, मोदी के समकक्ष अन्य किसी भाजपा नेता को खड़ा नहीं होने देना चाहते हैं। लिहाजा मोदी पिछड़ी जाति से आते हैं। व्यापमं में फस रहे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के बारे में भी कहा जाता है कि वे भी अत्यंत पिछड़ी जाति के हैं और मोदी वाली संभावना भी उनमें दिखती है। अब इन घोटालों और अनियमित्ताओं के प्रचार ने मोदी की कार्यशैली एवं शाह के संगठन कौशल पर प्रश्न खड़ा नहीं होगा। अब प्रचारित यह किया जाएगा कि बिहार एवं बंगाल की हार के लिए घोटाले एवं अनियमित्ता वाले नेता जिम्मेवार हैं, न कि मोदी की जनविरोधी नीतियां और शाह का संगठन कौशल। इसलिए कुल मिलाकर कहा जाए तो नरेन्द्र भाई और अमित भाई, बड़ी बारीकी से भाजपा के खिलाफ हो रहे प्रचार को अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने एवं अपने फायदे के रूप में उपयोग करने में सफल हो रहे हैं, ऐसा कहना गलत नहीं होगा।
फिलहाल कांग्रेस की रणनीति साफ है। मोदी के मंत्रियों और राजस्थान की मुख्यमंत्री के इस्तीफ़े की मांग को लेकर 20 जुलाई तक वो यूं ही रुक-रुक कर खेलती रहेगी। संसद का सत्र शुरू होते ही लंबे शाट्स खेलेगी। लेकिन इसके लिए कांग्रेस को आम आदमी पार्टी समेत तमाम विपक्षी पार्टियों का साथ चाहिए होगा जो उसको मिल सकता है। यानी कहना गलत न होगा कि चाहे संसद हो या सडक़ जवाब भाजपा को ही देना होगा।


निशाना किसका?
सवाल यह है कि भाजपा इस तरह जो आरोपों से घिर रही है उसके पीछे हैं कौन? क्योंकि मामला सुषमा, वसुंधरा, स्मृति और पकंजा पर खत्म नहीं हुआ बल्कि शिवराज और रमन सिंह भी इसकी जद में हैं। तीन बार मुख्यमंत्री रहे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पर भी चावल घाटाले का आरोप लगने लगा है। उन्हें भी प्रधानमंत्री मटेरियल बताया जा रहा है और उन्हें भी कुछ लोग मोदी के विकल्प के रूप में उभारने की कोशिश कर रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के ऊपर आरोपों की झड़ी लग चुकी है और कई मामले में केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली पर भी निशाना साधा जा रहा है। इधर, महाराष्ट्र के प्रभावशाली नेता गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु हो चुकी है और उनकी बेटी पंकजा के ऊपर अनियमित्ता का आरोप है। ऐसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विद्यार्थी शाखा के लोकप्रिय नेता रहे मराठा क्षेत्र के प्रभावशाली नेता विनोद तावडे के खिलाफ भी मामला उछल रहा है। वे भी प्रधानमंत्री मटेरियल के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे थे। इधर, संघ के चहेते भाजपा नेता नितिन गडकरी के खिलाफ कई मामले लंबित हैं। उन्हें भी प्रधानमंत्री का दावेदार बताया जा रहा था। संघ ने तो डंके की चोट पर महाराष्ट्र से सीधे उन्हें दिल्ली लाकर बिठा दिया, लेकिन कई घोटालों में नाम आने के बाद इन दिनों संघ भी चुप्पी साधे हुए है। अंत में अति ईमानदार छवि वाले गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिर्कर को आनन-फानन में केन्द्रीय प्रतिरक्षा मंत्री बनाया गया और नरेन्द्र मोदी के विकल्प की संभावना उनमें तलाशी जाने लगी। इस बीच सुना है कि उनके खिलाफ भी चुनाव के दौरान अपनी शिक्षा के विषय में चुनाव आयोग को गलत जानकारी देने का आरोप लग रहा है। यानी जिन भाजपा नेताओं में प्रधानमंत्री के विकल्प की छवि दिखाई दे रही है, उन्ही के खिलाफ अनियमित्ता का आरोप प्रचारित हो रहा है। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है क्योंकि कई संयोग एक साथ सामने आए तो उसे षड्यंत्र मान लेना चाहिए। दूसरी ओर भाजपा के अंदर मोदी समर्थकों को बारिकी से बचाया जा रहा है। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी के मामले को लगातार मीडिया में दबाए जाने का प्रयास किया जा रहा है। खुद अमित शाह कई मामलों में फंसे रहे हैं, लेकिन उनको मीडिया बड़ी तसल्ली से बचा रही है। इसका संकेत साफ है कि भाजपा के अंदर सत्ता का संघर्ष बड़ी तेजी से विस्तार प्राप्त कर रहा है। इन दिनों जब भाजपा नेताओं पर घोटालों और अनियमित्ताओं का आरोप प्रचारित हो रहा है, तो साफ-साफ भाजपा के दो गुटों के आपसी द्वन्द्व, जो परोक्ष रूप में था वह प्रत्यक्ष होने लगा है।

Tuesday, June 3, 2014

अडानी की नजर अब छत्तीसगढ़ पर


भले ही लाख तर्क दिए जाएं पर सच यही है कि नरेंद्र मोदी और अडानी काफी करीब है और अब मोदी के सत्ता पर काबिज होने के साथ ही अडानी की शक्ति में भी इजाफा हुआ है। गुजरात के बाद अब अडानी की नजर छत्तीसगढ़ पर है यही कारण है कि उनकी पैरवी पर विष्णुदेव साय केंद्र में मंत्री बने हैं।

यूं तो राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ समारोह में शामिल चार हजार लोग खास थे, लेकिन उसमें भी चार परिवार बेहद खास थे। औद्योगिक समूह की पहली पंक्ति में शुमार मुकेश अंबानी-नीता, अनिल अंबानी-टीना, अंबानी बंधुओं की मां कोकिला बेन, गौतम अडानी-प्रीति और वॉलीवुड स्टार सलमान खान। अडानी और अंबानी बंधुओं का इस आयोजन में आना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि महत्वपूर्ण था देश की बागडोर संभालने वाले महारथियों में अडानी का पलड़ा अंबानी से ज्यादा भारी होना। टीम मोदी में एक ऐसा अनजान चेहरा शपथ लिया था, जिसे सुबह तक पता नहीं था कि इस रेस में अडानी ने उस पर दांव लगा दिया है। वहीं, टीम मोदी से एक ऐसा चेहरा गायब था, जिसे लाने के लिए अंबानी ने सारे घोड़े खोल दिए थे। इसमें सबसे चतुर खिलाड़ी नरेन्द्र मोदी थे, जिन्होंने मुकेश अंबानी को नाराज किए बिना अडानी को खुश करने का रास्ता निकाल लिए थे।
सूत्र बताते हैं कि विष्णु देव साय को मंत्री बनवाने में अडानी की अहम भूमिका है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य के सबसे वरिष्ठ नेता रमेश बैस को दरकिनार कर मोदी ने साय को मंत्री बनाया। इससे संदेश ये गया जैसे रमन सिंह की सिफारिश पर साय को लिया गया हो, लेकिन कहानी दूसरी है। साय अडानी की पसंद हैं। वैसे तो मंत्री बनाए गए लगभग नेताओं को पता नहीं था कि वह टीम मोदी का हिस्सा बनने वाले हैं, लेकिन साय को खुद को इससे कोसों दूर मानकर चल रहे थे। शपथ-ग्रहण के दिन यानी 26 मई को साय के पास सुबह आठ बजे गुजरात भवन से फोन आता है। नरेंद्र मोदी से बात होती है। उन्हें गुजरात भवन बुलाया जाता है और शाम को शपथ लेने का न्यौता दिया जाता है। इस फैसले से साय खुद हैरान थे। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने खुद कहा था कि वे मंत्री पद की दौड़ में कहीं नहीं हैं। हालांकि, ये बात हर नेता कहता है, लेकिन साय का कहना इसलिए महत्वपूर्ण है कि साय छत्तीसगढ़ के उन आदिवासी नेताओं में हैं, जो राजनीति में होते हुए छल-प्रपंच नहीं करते। स्पष्ट बात और सच की स्वीकारोक्ति साय की खासियत है। सूत्र बताते हैं कि साय भी नहीं जानते कि उन्हें ये पद रमन सिंह की मेहरबानी और योग्यता पर नहीं मिला, बल्कि अडानी ने यह पद दिलाकर उन पर बड़ा दांव खेला है। सच की स्वीकारोक्ति विष्णुदेव साय की खासियत है। केंद्र में मंत्री पद मिलना उनकी इस खासियत का ईनाम नहीं, बल्कि अडानी के भरोसे के कारण मिला है। अडानी ने यह पद दिलाकर उन पर बड़ा दांव खेला है। अडानी जिस तरह की गोटी बिछा रहे हैं, उससे माना जा रहा है कि आने वाले कुछ महीनों में छत्तीगसढ़ में चेहरा बदल सकता है। पता चला है कि हाल के दिनों से अडानी की दिलचस्पी छत्तीसगढ़ में कुछ ज्यादा बढ़ गई है। वे छत्तीगसढ़ में कांग्रेस से जुड़े उद्योगपति नवीन जिंदल का किला ध्वस्त कर अपना बर्चस्व बढ़ाना चाहते हैं। इसको लेकर अंदरूनीतौर पर काफी दिनों से ताना-बाना बुना जा रहा है। उद्योगपतियों और सरकार के बीच सेतु का काम करने वाले अडानी द्वारा छत्तीसगढ़ में एक बड़े खेल की योजना बनाई गई है। बताया गया कि गौतम अडानी के लोग करीब एक माह से रायगढ़ क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे राज्य के चार आदिवासी नेताओं के साध कर राज्य में बड़े राजनीतिक उलटफेर का रास्ता तैयार कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में दो विपरीत मिजाज वाले आदिवासी नेताओं को साधकर अडानी कैंप की योजना राज्य में नेतृत्व परिवर्तन तक कराने की है। सूत्र बताते हैं कि अडानी जिस रणनीति से चल रहे हैं, उसमें मोदी का साथ मिलना तय है। हालांकि मोदी चतुर खिलाड़ी हैं, लेकिन अडानी जिस तरह की गोटी बिछा रहे हैं, मोदी भी उसे नहीं समझ पा रहे। लिहाजा, माना जा रहा है कि आने वाले कुछ महीनों में छत्तीगसढ़ में चेहरा बदल सकता है। सूत्रों ने बताया कि अडानी के इस गोपनीय मिशन में राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा, रामविचार नेताम, नंद कुमार साय और विष्णुदेव साय को टारगेट किया जा रहा है। अडानी गुट के लोग इन चारों नेताओं को अलग-अलग तरीके से ग्रिप में लेने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें दो नेता सीएम रमन सिंह के काफी करीबी हैं - रामसेवक पैकरा और विष्णुदेव साय। वहीं, नंद कुमार साय-रामविचार नेताम जैसे रमन सिंह विरोधी नेताओं के जरिए वहां आदिवासी नेतृत्व की मांग को बुलंद कराया जाएगा।
दरअसल, अडानी राज्य में अपने मनमाफिक सीएम को बिठाकर छत्तीसगढ़ का अकेला सम्राट बनने की योजना लेकर चल रहे हैं। इसके लिए उन्होंने सरकारी मशीनरी को सेट करने के साथ छत्तीसगढ़ में स्थापित जिंदल ग्रुप को उखाड़ने की कोशिश में जुट गए हैं। उल्लेखनीय है कि जिंदल ग्रुप किसी समय पर भाजपा नेताओं के करीबियों में शुमार था, लेकिन बाद में सत्ता से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलने के कारण बाहर खड़े होकर भाजपा सरकार के लिए परेशानी पैदा करने लगे। उधर, कोल ब्लॉक घोटाले में भाजपा नेता अजय संचेती और अडानी के ब्लॉक निरस्त कराने में जिंदल की अहम भूमिका मानी जाती है। कहा जाता है कि तभी से अडानी ने मिशन छत्तीसगढ़ की योजना बनाकर वहां अपने दूतों को भेजा और वे दूत पूरी शिद्दत से काम को अंजाम देने में लगे हुए हैं।
कहा तो यह भी जा रहा है कि गौतम अडानी को छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और नरेंद्र मोदी के बीच मतभेद का भी लाभ मिल रहा है। सीएम रमन सिंह दोहरी आस्था के कारण संदिग्ध हैं। मोदी उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं देते। अडानी के मोदी से नजदीकी रिश्ते हैं। अडानी जहां मोदी के साथ मिलकर खेल जमाने में सफल रहे, वहीं मुकेश अंबानी अपना खेल नहीं जमा पाए। सूत्र बताते हैं कि मुकेश अंबानी अरुण शौरी को वित्तमंत्री बनवाना चाहते थे। शौरी उनकी पसंद थे और मोदी को यह बात बताकर उन्हें राजी करने का हरसंभव प्रयास किया गया। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में पहला मौका है, जब मुकेश अंबानी की पसंद को नजरअंदाज कर दिया गया। सूत्र बताते हैं कि मोदी शौरी को कहीं और भले समायोजित कर लें, लेकिन वह ये संदेश देने से बचना चाहते थे कि उनकी टीम में अंबानी के लोग हैं। इसलिए वित्तमंत्री का पद किसी और को देने की बजाय अपने सिपहसालार अरुण जेटली को दिया। हालांकि, अंबानी के लिए ये एक बड़ा झटका कहा जाएगा, क्योंकि इसके पहले हर वित्तमंत्री उनके इशारे पर बनता था। इसमें मजेदार बात ये है कि मोदी ने सारा काम इतनी चतुराई से किया है कि न अडानी को अंबानी की मंशा की भनक लगने दी और न अंबानी को अडानी का खेल पता चलने दिया। मतलब मोदी ने अंबानी को नाराज किए बिना अडानी को खुश करने का कूटनीतिक रास्ता निकाल जता दिया कि राजनीति में वह कितने उस्ताद हैं।  

Wednesday, December 12, 2012

छाया नशा 12-12 12 का


12-12-12 का आंकड़ा सौ साल बाद आएगा इसलिए इस दिन को युवावर्ग भाग्यशाली मान रहा है। फिर चाहे हो वो आम लोग हो या ज्योतिष सभी के अनुसार 12-12-12 का ये आंकड़ा अपने आप में अदभुत है। यही कारण कारण है कि शादी से लेकर बच्चे के जन्म और नई नौकरी ज्वाइन करने से लेकर कोई भी नया काम करने के लिए लोग इस दिन का बेकरारी से इंतजार कर रहे हैं।

जिस तरह पिछले साल 11-11-11 की तारीख को लेकर लोग खासकर युवा पागल थे उसी तरह इस साल 12-12-12 के जादुई तारीख को लेकर भी युवाओं का जुनून देखते ही बन रहा है। इस तारीख का जादू हर किसी के सिर चढ़ कर बोल रहा है। देश भर में लोग इस दिन को यादगार बनाने का मन बना रहे है, जिन के घरो में नवजात आने वाला है वो लोग किसी भी तरह अपने घरो के चिराग को इसी अदभुत योग नक्षत्र की घड़ी में जन्म देना चाहते है, कुछ माएं तो असहनीय प्रसव पीड़ा को 24 घंटे ओर सहने को तैयार है। साथ ही युवा जोड़े इस दिन शादी करने के लिए जहां अदालतों में रजिस्ट्री करवा चुके हैं वहींइस दिन के लिए पंडितों व ज्योतिषाचर्यो से खास मुहूर्त भी निकलवाया जा रहा है।

यादगार बनाने की होड़
इस महीने 12-12-12 की खास तिथि को कई लोग अपने-अपने तरीके से यादगार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कोई इस दिन विवाह, तो कोई नन्हे मेहमान को घर लाने की तैयारी में है। वहीं युवा इस दिन को पार्टी के साथ सेलिब्रेट कर रहे हैं। 12 दिसंबर यानी 12-12-12 को शहर के कई लोग खास तिथि के रूप में देख रहे हैं। कोशिश कर रहे हैं कि उस दिन उनकी जिंदगी में कोई ऐसी चीज हो, जो हमेशा के लिए यादगार बन जाये। यही वजह है कि लोग अपने घर में नया मेहमान लाने के लिए भी इस तारीख को चुन रहे हैं। कई बड़े अस्पतालों के डॉक्टर्स के अनुसार जिन महिलाओं की डिलीवरी डेट दिसंबर के पहले या दूसरे सप्ताह में है, वे अपना ऑपरेशन 12 दिसंबर को कराने की इच्छा जता रही हैं। वैसे तो इस दिन हिंदुओं में पारंपरिक रीति-रिवाज से शादी का कोई मुहूर्त नहीं है। पर कई जोडिय़ां इस खास दिन पर कोर्ट मैरिज या फेरों के साथ शादी करने के लिए तैयार हैं। कई लोग अपने नए शाप को इसी दिन इसे लांच करने की योजना बना चुके हैं। वो सभी 12 दिसंबर को ही अपने शॉप की शुरुआत करना चाहते हैं ताकि सभी के लिए ये दिन यादगार बन जाए। जिनका जन्मदिन 12 दिसंबर को आता है वो भी इस खास तारीख को यादगार बनाना चाहते हैं। कुछ युवा इस खास दिन को पार्टी करके सेलिब्रेट करने की तैयारी की है। कुल मिलाकर कोई भी इस तारीख को यूं ही नहींजाने देना चाहता है।

गूंजेगी शादी की शहनाई
हर जोड़ें का बस यही सपना होता है कि उनकी शादी इतनी यादगार बने कि सालों तक लोग इसे याद रखें। अपनी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए इस साल सैकड़ों जोड़ों ने एक अनोखी तारीख के दिन सात जन्मों के इस बंधन में बंधने की प्लैनिंग की है। ये तारीख है इस साल दिसंबर के महीने में 12 तारीख जो एक अनोखा योग बना रही है। इस बेहद अनोखी तारीख को कई कपल अपने जीवन का सबसे यादगार दिन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। भले ही हिंदू धर्म के अनुसार इस तारीख को कोई शादी का साया नहीं पड़ रहा है। लेकिन कई जोड़े इस डेट को शादी करने के लिए पंडित जी के पंचांग को छोड़ न्यूमेरोलॉजिस्ट की सहायता ले रहे हैं। जो लोग इस दिन शादी करने वाले हैं उनका मानना है कि शादी जीवन का एक ऐसा उत्सव है जो हमेशा यादगार रहता है। ऐसे में ये तारीख एक स्पेशल दिन को और भी स्पेशल बना देगी।  हालांकि इस तारीख को कोई शुभ मुहूर्त तो नहीं हैं, पर अंक विज्ञान के अनुसार 12-12-12 यानी 3 3 3= 9 होता है। ये तारीख मंगल कार्य के लिए उत्तम है। लेकिन ज्योतिष की माने तो ये भी देखना पड़ेगा कि जिन कपल का आपसी तालमेल मंगल के कारण बिगड़ रहा है, उनको ये तारीख नहीं अपनानी चाहिए।

नन्हे मेहमान को लाने का जुनून
पटेल अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. शमा बत्रा कहती हैं कि कभी गाडिय़ों के वीआईपी नंबर के लिए मारामारी होती थी। इसके बाद मोबाइल नंबर की बारी आई लेकिन अब एक तय तारीख पर बच्चा पैदा करने की तैयारी जोरों पर है। फिलहाल हर जगह बच्चों की पैदाइश इस तय तारीख पर कराने के लिए बुकिंग की लाइन लग रही है और ये तारीख है 12-12-12। तय तारीख पर डिलीवरी कराने की ये प्रकिया मुश्किल ही नहीं कभी कभी खतरनाक भी साबित हो सकता है। जिन महिलाओं की पहली डिलीवरी है, उनको तों खास तौर पर इस तरह की तारीखों पर बच्चे पैदा कराने पर डॉक्टर साफ मना भी कर रहे हैं। इतना ही नहीं यदि उनके परिजनों की भी काउंसलिंग की जा रही है। डॉक्टर इस बात पर खास गौर कर रहे हैं कि मां ने कम से कम 38 हफ्ते पूरे कर लिए हों। कई डॉक्टर इस तरह के ऑफरेशन से साफ मना कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रकृति को उसका काम करने दिया जाना चाहिए। ऐसी मांग करने वाली कुछ माओं को तो सख्त हिदायत दी गई है कि वो अपना जुनून छोड़ दें क्योंकि वक्त से पहले या बाद में बच्चे की पैदाइश में जच्चा-बच्चा के साथ ऑपरेशन के दौरान भी और बाद में भी पैदा बच्चे में गड़बड़ी की आशंका रहती है। पर फिर भी बच्चों की किस्मत को चार चांद लगाने के लिए लोग तारीखों का चुनाव खुद कर रहे हैं। कोशिशे ये हैं कि बच्चा तय शुदा तारीख पर ही पैदा हो इसके लिए इस बार 12 के तिलिस्म को तरजीह दी गई है। इसे शुभ माना जा रहा है। मानना है कि ये बच्चे के लिए शुभ होगा। अंक ज्योतिष के अनुसार बच्चे का इस तारीख को जन्म उसके पुरे जीवन के लए शुभ होगा। उसके व्यवहार से लेकर कैरियर की कामयाबियों तक उसकी जन्म तारीख उसके लिए भाग्यशाली साबित होगा।

ऐसी दीवानगी ठीक नहीं
मनोवैज्ञानिक डा. समीर पारिख कहते हैं कि 12-12-12 जैसी अनोखी तारीख देखने में ये संख्या जितनी रोचक और आकर्षक लग रही है, उतना ही युवाओं को भटकाने वाली भी है। इस संख्या का प्रभाव इतना है कि जिन युवाओं का विवाह निर्धारित हो चुका है वो इसी दिन विवाह करना चाह रहे हैं। इस तिथि के प्रति लोग इतने उत्सुक हैं कि पंडितों या शुभ मुहूर्त का भी ख्याल नहीं कर रहे हैं। अगर 12-12-12 के प्रति आकर्षण का कारण सिर्फ रोचकता होता तो फिर भी इसे हम उत्सुक युवाओं की सोच कह सकते थे लेकिन हैरानी वाली बात ये है कि युवाओं के मस्तिष्क में ये सोच भी अपनेआप ही अवतरित नहीं हुई बल्कि इस मानसिकता पर भी न्यूमरोलॉजी का पूरा प्रभाव है। इस रोचकता को भी ज्योतिषीय कोण के आधार पर देखा जाए तो समझ में आ जाएगा कि हमारे युवा कितने फ्री माइंडेड और अंध-विश्वास के दूर रहने वाले हैं। कथनों से प्रभावित होकर ही युवा 12-12-12 को विवाह करने या फिर संतान को दुनियां में लाने के लिए बहुत जागरुक और उत्सुक हो गए हैं। कई महीनों पहले ही लोगों ने विवाह के लिए स्थान सहित सभी जरूरी प्रबंध कर लिए हैं। वहीं महिलाओं ने इसी दिन अपने बच्चे को जन्म देने के लिए डॉक्टरों से समय ले लिया है लेकिन क्या किसी विशेष तारीख पर विवाह करने या जन्म लेने वाले व्यक्तियों के सफल और खुशहाल जीवन की गारंटी ली जा सकती है? कुल मिलाकर इसे एक तरह का अंधविश्वास ही कहेगे जिसके रौ में बहुतायत में युवा बह रहे हैं।

ज्योतिषी मान रहे हैं शुभ
ज्योतिषाचार्य पं. संजीव शर्मा की माने तो 12-12-12 का ये आंकड़ा अपने आप में अदभुत है और ज्योतिष के हर अंग के अनुसार ये तिथि चमत्कारी है। इस दिन का नक्षत्र, योग अपने आप में अदभुत है और 12-12-12 साल का आखिरी अनूठा संयोग है। अगला अनूठा संयोग 100 साल बाद आयेगा। इस दिन जन्म लेनेवाले बच्चे भविष्य में कभी असफल नहीं होंगे। इन बच्चों का मूलांक तीन और भाग्यांक दो रहेगा। ये किसी भी विषम परिस्थिति में सामना आसानी से कर सकेंगे क्योंकि ये हर बात पर अडिग रहनेवाले होंगे। इसलिए जो भी लक्ष्य निर्धारित करेंगे, उसे वे हासिल भी करेंगे। 12 में एक और दो है। इसलिए इसका मूलांक एक जोड़ दो यानी तीन होता है। तीन मूलांक का कारक बृहस्पति होता है। बृहस्पति के प्रभाव से ये संयोग बहुत ही शुभ साबित होता है। ऐसे अंक वाले जातक अलग पहचान, अलग व्यक्तिव रखते हैं। वे उच्च आकांक्षावाले होते हैं। इस योग में अब्राहम लिंकन, चर्चिल, चाल्र्स रॉबर्ट जैसे महान लोगों का जन्म हुआ था। पर विवाह के लिए इस दिन कोई मुहूर्त नहींहै। अंकशास्त्री पं. रूपेश जैन कहते हैं कि 12-12-12 की तिकड़ी व्यक्ति के जीवन में ठहराव और सामंजस्य ला सकती है। हिंदू नक्षत्रों के आधार पर न्यूमरोलॉजी को अध्यात्म से जोडक़र भी देखा जा रहा है। ये दिन आपके जीवन से नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकता है। वे जोड़े जो इस दिन विवाह बंधन में बंधेंगे या जो जन्म लेंगे उनको दैवीय आशिर्वाद प्राप्त होगा और वे एक खुशहाल जीवन जी पाएंगे।

Saturday, August 18, 2012

लव सेक्स और सत्ता


सियासतदां अभी शेहला मसूद और भंवरी के भंवर से निकल भी नहींपाएं है कि गीतिका और फिजा की मौत ने राजनीतिक हलकों में फिर हडक़ंप मचा दिया है। वैसे भी जब-जब सियासत नंगी हुई है, तब-तब अवाम शर्मिंदा हुआ है। हर बार कीमत लोकतंत्र को चुकानी पड़ी है। पहले भी कई ऐसे कांड हुए हैं जिसने सफेदपोशों के चोहरों पर  काली स्याही पोत दी है।



नैना साहनी, मधुमिता शुक्ला, शशि प्रसाद, भंवरी देवी, गीतिका शर्मा और अब फिजा इन सबके जीवन की कहानी लगभग एक जैसी है। सभी ने अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए राजनीतिक शख्सियतों का सहारा लिया और अपना सबकुछ उनपर लुटा दिया पर बदले में न सत्ता मिली न ही जिंदगी जीने का हक। इन सबके रातों रात चमकने के सपने ने इनसे इनकी आखिरी सांसे भी छीन ली। किसी को अज्ञात हमलावरों ने गोलियों से भून डाला तो किसी को तंदूर की आग के भेट चढऩा पड़ा। पर ये सिलसिला यहींरुका नहींहै और शायद कभी रुकेगा भी नहीं क्योंकि सत्ता का नशा और सत्ता का उपयोग अपने विलासिता के साधन जुटाने में करना नेताओं के लिए नया ट्रेंड नहीं है। बस हर बार इसको डील करने का तरीका बदल जाता है।

अगर नैना साहनी में राजनीतिक महत्वकांक्षा और समाज में नाम पाने का जुनून न जागता और युवक कांग्रेस का दबंग नेता सुशील शर्मा उसकी इस महत्वकांक्षा को पूरा करने का वादा न करते तो शायद नैना का हश्र इतना दहला देने वाला न होता। मंदिर मार्ग के एक फ्लैट में कांग्रेस का खूबसूरत और तेजतर्रार युवा नेता नैना साहनी के साथ में रहता था। नैना को भले ही सुशील ने अपने घर वालों से कभी नहीं मिलवाया था, लेकिन तेज दिमाग नैना के दबाव के चलते उसको गुपचुप शादी करनी पड़ी थी। नैना के भी पॉलिटिकल रिश्ते थे, जो सुशील को बाद में अखरने लगे थे और यही उसकी हत्या की भी वजह भी बने। 2 जुलाई 1995 की रात कांस्टेबल अब्दुल कादिर कुंजू और होमगार्ड चंद्रपाल को दिल्ली के ओपन एयर रेस्तरां से उठने वाला धुंआ कुछ इतना ज्यादा लगा कि वो चैक करने के लिए अंदर जा पहुंचे। अंदर पहुंचते ही बदबू आना शुरू हो गई। ये दोनों पुलिस वाले अगर अंदर नहीं जाते तो दुनिया कभी भी तंदूर कांड से रूबरू नहीं हो पाती। सुशील ने नैना को ठिकाने लगाने का मन तब बनाया जब किसी बात को लेकर दोनों में कहासुनी हो गई और गुस्से में सुशील ने नैना पर अपने लाइसेंसी रिवॉल्वर से दाग दीं एक-एक करके पूरी तीन गोलियां। जान लेने के बाद भी उसका गुस्सा खत्म नहीं हुआ। उसने रेस्तरां के मैनेजर के साथ मिलकर लाश के टुकड़े-टुकड़े कर उनको जलते तंदूर में झोंक दिया। नैना साहनी की दर्दनाक हत्या ने सरकार को हिलाकर रख दिया। कांग्रेस के नेता का यह रूप देखकर हर कोई हैरत में था। सरकार को न जवाब देते बन रहा था न कार्यवाही करते। मजबूरन लोगों और मीडिया के दबाव के चलते पुलिस और प्रशासन सक्रिय हुआ। पुलिस की बढ़ती गतिविधियों के चलते सुशील को सरेंडर करना पड़ा। लेकिन वह इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था। हर बार वह पुलिस को उलझाता रहा। बयानों के लगातार बदलने और झूठ बोलने के कारण मामला उलझता जा रहा था। सुशील ने फ्लैट से लेकर, उसमें मिले कागजातों तक को अपना मानने से इनकार कर दिया। इसी बीच नैना साहनी की एक डायरी में 3 जुलाई को नैना की लिखावट का लेख भी मिला। सुशील ने बस उसे पहचाना ताकि ये साबित किया जा सके कि नैना 2 जुलाई को मरी ही नहीं। कई वकीलों ने इस केस से हाथ खींचा तो सुशील ने भी तमाम कानूनी दांवपेच भिड़ाए। लेकिन मीडिया के जरिए पब्लिक प्रेशर काम आया, जांच अधिकारियों को सतर्कता बरतनी पड़ी और कोर्ट ने सुशील को फांसी की सजा सुना दी। फिलहाल सुशील जेल में है और सुप्रीम कोर्ट से राहत भरे फैसले की उम्मीद कर रहा है।
राजनीतिक मुहब्बत की एक और खूनी दास्तां है युवा कवयित्री मधुमिता शुक्ला और उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी की जहां मधु को अपनी जान गवां कर एक नेता से प्रेम करने का कर्ज चुकाना पड़ा। कम उम्र का जोश, वीर रस की कविताएं, दबंग राजनेता की मोहब्बत, सियासत का रसूख इस कॉकटेल के नशे में मधुमिता जिंदगी और प्रेम की अपनी इबारत गढऩे लगी। जिस समय अमरमणि से उसकी मुलाकात हुई थी, तब उसकी उम्र महज 18 साल थी, जबकि 45 साल के अमर मणि न केवल शादीशुदा थे, बल्कि बच्चों के बाप भी थे। एक नवोदित कवयित्री मधुमिता शुक्ला और अमरमणि की प्रेम कहानी बदस्तूर चलती रहती अगर मधुमिता ने अमरमणि पर विवाह करने का जोर ना डाला होता। यूपी के स्टांप और रजिस्ट्रेशन राज्य मंत्री (तत्कालीन मायावती सरकार में) अमरमणि त्रिपाठी के प्यार में पागल यह कवयित्री उसके अवैध अंश को जन्म देना चाहती थी। लेकिन मंत्री साहब को यह गवारा नहीं था। मई 2003 को अचानक मधुमिता की उनके लखनऊ स्थित पेपर मिल कालोनी के घर में हत्या कर दी जाती है। शक की सुई मंत्री अमरमणि त्रिपाठी पर उठीं। मधुमिता की मौत के बाद डायरी और पत्रों से इस बात का साफ खुलासा हो गया कि त्रिपाठी के दबाव में मधुमिता दो बार गर्भपात करवा चुकी थी। जिस समय हत्या हुई, उस समय भी वे छह माह की गर्भवती थी। मधुमिता की हत्या ने उत्तरप्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। मीडिया के दबाव चलते अंत्येष्टि से चंद घंटे पहले मधुमिता के शव से भ्रूण निकालने के लिए पुलिस को मजबूर कर दिया। अजन्मे बच्चे का डीएनए टेस्ट से मधुमिता और त्रिपाठी के रिश्तों की पुष्टि हो गई। मीडिया का साथ मिला तो लखीमपुर में रह रही मधुमिता की बड़ी बहन निधि में भी हिम्मत दिखाई। दबाव बढऩे लगा, जांच में तेजी आई और राजफाश होने लगे। पता चला मधुमिता की हत्या में अमरमणि और उसकी पत्नी मधुमणि दोनों का हाथ था। खतरनाक प्रेम की भेंट में जहां मधुमिता को जान से हाथ धोना पड़ा वहीं त्रिपाठी भी उम्रकैद की सजा भी काट रहा है। अमरमणि को 21 सितंबर 2003 को में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उनकी जमानत की अर्जी भी ठुकरा दी जाती है। 24 अक्टूबर 2007 को देहरादून में एक विशेष अदालत ने मंत्री अमरमणि त्रिपाठी, उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी, उनके चचेरा भाई रोहित चतुर्वेदी और उनके सहयोगी संतोष राय को मधुमिता शुक्ला की हत्या के मामले में दोषी पाया। अदालत ने अमरमणि को आजीवन कारावस की सजा सुनाई।
फैजाबाद की रहने वाली शशि प्रसाद लॉ की स्टूडेंट थी। वह राजनीति में आना चाहती थी। इसलिए शार्टकट के रूप में उसने मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री आनंद सेन को चुना। आनंद सेन ने भी उसकी आंखों में बसे इस ख्बाव को देख लिया था। फिर शुरू हुआ वायदों का सिलसिला। वायदे बढ़ते गए, जिस्मानी दूरियां मिटती गईं। बीएसपी कार्यकर्ता राजेंद्र प्रसाद की बेटी शशि प्रसाद के आनंद सेन के साथ संबंध बने पर इस संबंध से उसे सत्ता सुख तो नहींमिला पर मौत जरूर मिली। 22 अक्टूबर 2007 को शशि अचानक गायब हो गई। गुमशुदगी की सूचना 23 अक्टूबर 2007 को दर्ज कराई गई। एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी जब शशि का कुछ पता नहीं चला तो शशि के पिता ने आनंद पर अपहरण और हत्या का आरोप लगाया। मामले में आनंद और उनके ड्राइवर विजय को आरोपी बनाया गया। लंबी छानबीन और धड़पकड़ के बाद पता चला कि वह इस दुनिया से जा चुकी थी। उसकी हत्या हो गई थी। फैजाबाद की अदालत ने आनंद सेन और उसके ड्राइवर को उम्रकैद की सजा सुनाई।
हाल ही राजस्थान की गवर्नमेंट को हिलाने वाली भंवरी देवी का केस पिछले कई दिनों से सुर्खियों में है। सत्ता का नशा और सत्ता का उपयोग अपने विलासिता के साधन जुटाने में करना नेताओं के लिए नया ट्रेंड नहीं है। पर जब उनकी विलासिता की वस्तु पलटकर उनका गिरहबान पकड़ लेती है और उनको ब्लैकमेल करने लगती है तो उसका हश्र सिर्फ मौत ही होता है।

पेशे से नर्स भंवरी देवी कोई साधारण महिला नहीं थी, बल्कि सत्ता के गलियारों में जहां उसकी ऊंची पहुंच थी, वहीं इस पहुंच को बरकरार रखने के लिए उसने शार्टकट का इस्तेमाल करने तक से गुरेज नहीं किया। जैसलमेर सरकारी अस्पताल में नर्स भंवरी देवी 2001 में कॉग्रेस एमएलए मल्खान सिंह बिश्नोई के संपर्क में आईं और बाद में राजस्थान के वॉटर रिसोर्स मिनिस्टर महिपाल मदेरणा के संपर्क में। बिश्नोई को मंत्री बनाने के लिए मदेरणा के साथ अश्लील सीडी बनाई ताकि गहलोत कैबिनेट में उन्हें बदनाम कर हटाया जा सके। भंवरी ने मदेरणा और बिश्नोई दोनों के साथ अश्लील सीडी तैयार की और दोनों को ब्लैकमेल करती रहीं। 1 सितंबर 2011 में भंवरी लापता हो गई। 2 दिसंबर को मदेरणा कैबिनेट से बाहर हुए और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। भंवरी देवी का अपहरण हुआ है, वह बंधक है या फिर उसकी हत्या कर उसे जला दिया गया है, यह अभी तक रहस्य बना हुआ है, लेकिन इस मामले ने फिर एक बार कांग्रेसी नेताओं की इज्जत उतार कर जरूर रख दी है।

 एमडीएलआर की पूर्व एयर होस्टेस गीतिका शर्मा ने 4 अगस्त की देर रात अशोक विहार फेज-3 स्थित अपने फ्लैट में पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली थी। उनका शव रविवार सुबह उनके परिजनों ने पंखे से उतारा। 2 पेज के सूइसाइड नोट में गीतिका ने हरियाणा के पूर्व मंत्री गोपाल कांडा और उसी कंपनी की मैनेजर अरुणा चड्ढा पर मानसिक प्रताडऩा का आरोप लगाया था। पुलिस ने दोनों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया। सूइसाइड नोट के सार्वजनिक होने के कुछ ही घंटों बाद कांडा ने इस्तीफा दे दिया और कहा कि यह उनके खिलाफ कोई राजनैतिक षड्यंत्र का हिस्सा है जबकि गीतिका ने सुसाइड नोट में लिखा है कि कांडा उसका पायाद उठाना चाहते थे।

अनुराधा बाली यानी फिजा की संदिग्ध हालात में मौत हो गई। फिजा 2008 में उस समय सुर्खियों में आई थीं जब उन्होंने हरियाणा के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री चंद्रमोहन से शादी की थी। दिसंबर 2008 में जब पूरा देश मुंबई के आतंकवादी हमलों से जूझ रहा था ऐसे में हरियाणा की जमीं पर कुछ नया और अनोखा ही पक रहा था। जन्म से हिन्दू चंदर मोहन और अनुराधा ने देश के 2.3 करोड़ हिंदुओं की भावनाओं पर चोट करते हुए यह घोषणा की कि उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है और चांद मोहम्मद और फिजा बन एक दूसरे के साथ निकाह पढ़ लिया है। 43 साल के इस अधेड़ ने इस्लाम कबूलकर दूसरा विवाह रचा लिया क्योंकि उसकी पहली पत्नी जिंदा है उससे उन्हें दो बच्चे भी हैं। पर चंदर उर्फ चांद ने जितने जोर-शोर से अपने निकाह का ऐलान किया था उतनी ही तेजी से वह इससे दूर भी हो गए। इसका कारण था कि उनके पिता ने उनसे सारे अधिकार छीन लिए थे।

चंदर के प्यार में अपनी नौकरी तक दांव पर लगाने वाली फिजा फिर से सुश्री बाली बन अपनी मां के साथ बेरोजगारी में दिन बिताने लगी। उसपर कर्ज बढ़ते जा रहे थे और प्यार की नाकामी का गम भी। इस गम को मिटाने के लिए वह शराब पीने लगी और लोगों से बात बेबात झगडऩे भी लगी। जितना खूबसूरत इस कहानी का आगाज था उतना ही दर्दनाक फिजा यानी अनुराधा का अंत है। अपने 41वें जन्मदिन के 10 दिन बाद 6 अगस्त 2012 को फिजा मरी हुई पाई गईं। उनका शव उनकी मौत के तीसरे दिन बरामद हुआ। उनका खूबसूरत शरीर सड़ चुका था और उसमें कीड़े रेंग रहे थे। शुरूआती जांच के बाद पुलिस ने कहा कि अनुराधा ने फांसी लगाकर आत्महत्या की है। पुलिस की यह बात सच मानी जा सकती थी क्योंकि अनुराधा पहले भी आत्महत्या करने की कोशिश कर चुकी है। वह जीवन से निराश भी थी पर फांसी लगाने का बाद उसका शव बिस्तर पर कैसे आया, उसके घर में ढेर सारी शराब की बोतले क्या कर रही थीं और क्यों चद्रमोहन उसका जिक्र तक नहींकरना चाहते जैसे सवाल उसकी मौत को संदिग्ध बनाते हैं।

अपनी भूख शांत करने के बाद हमारे देश के पॉलिटिशियंस ने अपनी इन तथाकथित ‘प्रेमिकाओं’ को ही ठिकाने लगा दिया। उसका न तो इन्हें कभी कोई पछतावा रहा और न ही इनके परविार के सदस्यों को। आज भी इस तरह के गुनाह करने वालों को कोई मुक्कमल सजा नहींमिली है। इनके केस अदालत दर अदालत चल रहे हैं और ये बेशर्मकी तरह जी रहे हैं। इन्हें तो कभी शर्म आएगी नहीं, लेकिन हम जैसे लोगों को भी इनके कारनामे सामने आने के बावजूद शर्म नहीं आती और जब यह वोट की भीख मांगते हुए हमारी चौखट पर आते हैं तो समाज-नैतिकता के नाम पर दुहाई देने वाले हम लोग ही इन्हें चुनकर सत्ता में भेज देते हैं। जब तक लड़कियां अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए शार्टकट अपनाती रहेंगी और सियासतदां अपने शरीर की भूख मिटाने के लिए ऐसी महिलाओं और लड़कियों को अपना शिकार बनाते रहेंगे तब तक इस तरह की घटनाएं घटती रहेंगी और सियासत शर्मसार होती रहेगी।

Wednesday, February 8, 2012

कहां प्लेस की जा रही हैं लड़कियां

पिछले आठ वर्षो के दौरान मानव तस्कर छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाके सरगुजा, रायगढ़ और जशपुर से भोली-भाली लड़कियों को नौकरी और प्रशिक्षण के नाम पर भगा कर ले जा रहे हैं। बाद में इन लड़कियों को दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरू और चेन्नई जैसे महानगरों में ले जाकर बेच (प्लेस कर) दिया जाता है। गौरतलब यह है कि ऐसे है आदिवासी इलाके जहां नक्सलियों की कुछ खास दखल नहीं है।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों से बड़े पैमाने पर लड़कियों की बिक्री किए जाने और उन्हें देश के महानगरों में बंधुवा बनाए जाने की घटनाओं ने राज्य शासन की नींद उड़ा दी है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लगातार इस तरह की तरह घटनाएं सामने आ रही हैं। जिस समय एक्टर शाइनी आहूजा का अपनी आदिवासी नौकरानी के साथ रेप का प्रकरण चर्चा में था, उसी समय छत्तीसगढ़ की नाबालिग लड़कियों की मंडी के कहे जाने वाले जशपुर में मुंबई पुलिस का एक दल बंधक बनाई गई लड़की को छोडऩे के लिए आया हुआ था। यह इस बात का बड़ा सबूत है कि छत्तीसगढ़ की आदिवासी लड़कियां न सिर्फ बाहर भेजी जा रही है बल्कि बेची भी जा रही हैं। बावजूद इसके न तो मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह इस बात को मानने को तैयार हैं और न ही गृहमंत्री ननकी राम कंवर। पिछले कई सालों से इन इलाकों से प्लेसमेंट एजेंसी के नाम पर अशिक्षित या अर्धशिक्षित गरीब आदिवासी युवतियों को घरों में काम दिलाने के बहाने शहरों में पहुंचा देना कोई मुश्किल काम नहीं है। फिलहाल सिर्फ दिल्ली में तकरीबन 200 प्लेसमेंट एजेंसियां है, जो छत्तीसगढ़ के सरगुजा, जशपुर के अलावा झारखंड के रांची, गुमला, पलामू आदि इलाकों से आदिवासी लड़कियों को घरेलू नौकरानी का काम दिलाने आकर्षित करती हैं। उनके निशाने पर हैं उरांव आदिवासी लड़कियां हैं जिनमें से अधिकांश ने मिशनरियों के प्रभाव में आकर इसाई धर्म अपना लिया है। इनके एजेंट का काम इन लड़कियों के वे रिश्तेदार करते हैं, जो कई साल पहले से ही इन महानगरों में काम कर रहे होते हैं।

दिल्ली की ज्यादातर प्लेसमेंट एजेंसियों के संचालक उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड के संदिग्ध प्रवृति के लोग हैं। पहले ये खुद छत्तीसगढ़ जाकर लड़कियों को तलाश कर ले जाते थे लेकिन पिछले दो साल से जब इनके खिलाफ अंचल में आवाज उठने लगी है तो उन आदिवासी लड़की लड़कों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो इन गांवों से पहले से ही निकलकर दिल्ली पहुंच चुके हैं। इन प्लेसमेंन्ट एजेंसियों ने स्वयंसेवी संगठनों और सरकारी विभागों की आंख में धूल झोंकने के लिए बहुत से नियम कायदे बना रखे हैं। जिनमें से एक यह भी है कि नाबालिग लड़कियों को काम पर नहीं रखा जायेगा। पर अब तक देखने में यही आया है कि उनके निशाने पर 8 से 14 साल की लड़कियां ही हैं। प्लेसमेंट एजेंसियां चलाने वाले ऐसी लड़कियां लाने वाले दलालों को आने-जाने का खर्च और 5 से 15 हजार रूपये तोहफे के तौर पर देते हैं। रोजगार की तलाश में ये युवतियां बड़े शहरों में पहुंचने के बाद असामाजिक तत्वों के चंगुल में फंस जाती हैं। वैसे तो गाहे बगाह कुछ लोगों कुछ लोगों को इस मामले में गिरफ्तार भी किया जाता है पर लड़कियों को बहला-फुसला कर बाहर ले जाने का सिलसिला थम नहींरहा है। लड़कियों को भारत के दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरू और चेन्नई जैसे महानगरों में तो प्लसमेंट दिया ही जाता है साथ ही इन लड़कियों को घरेलू काम कराने के बहाने से कुवैत और जापान तक भी ले जाया जाता है।
मानव व्यापार के मुद्दे ने 2007 में भी जोर पकड़ा था, जब मिशनरियों द्वारा संचालित कुनकुरी की स्वयंसेवी संस्था ने अपने सर्वेक्षण में 3718 युवतियों के गायब होने का खुलासा किया था। संस्था ने बताया था कि इन युवतियों को दिल्ली एवं अन्य महानगरों में बेचा गया। आदिवासी क्षेत्रों में लड़कियों को उठाने वाले दलालों के गिरोह भी सक्रिय हैं। वर्ष 2007 में तत्कालीन भाजपा विधायक राजलिन बेकमेन एवं राकपा के नोबेल वर्मा ने इस मामले को विधानसभा में भी उठाया था। पर मामला आया गया हो गया। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में मानव तस्करी का व्यवसाय अनवरत जारी है और सरकार इसके विरुद्ध आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी कानून को सख्ती से लागू कर पाने में असफल रही है। दिल्ली और राज्य के कई स्वयंसेवी संगठनों की आवाज भी सरकार को इस मामले में कदम उठाने के लिए राजी नहींकर पा रही हैं।
राज्य के बिलासपुर, जशपुर, रायगढ़ और सरगुजा जिले में लड़कियों के अपहरण के कई मामले दर्ज हैं, जिनमें लगातार वृद्धि हो रही है पर यह ऐसे इलाके हैं जहां नक्सलियोंं की दखल कुछ कम हैं। इस तरह तो यही बात सामने आता है कि जिन क्षेत्रों में नक्सलियों का जोर है वहां की आदिवासी लड़कियों ज्यादा सुरक्षित हैं। गौर करने वाली बात यह है कि आज जिन आदिवासी इलाकों से लड़कियां गायब हो रही हैं वह ऐसे इलाके हैं जहां नक्सलियों का दखल कम है या न के बराबर है। आज जितनी भी प्लसमेंट एजेसियां छत्तीसगढ़ में अपना शिकार ढूढ़ रही हैं वह सब ऐसे इलाकों का ओर रूख नहींकरती जहां नक्सलियों का बोलबाला है। राज्य के बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कांकेर आदि जिलों में जहां नक्सलियों का राज चलता है वहां न तो प्लसमेंट एंजेसियां पूर्ण रूप से सक्रिय हैं और न ही मिशनरी।
प्रदेश भाजपा सरकार मानव तस्करी को रोक पाने में असफल है। परिणाम यह है कि मासूम, भोली-भाली आदिवासी बालाओं की खरीद-बिक्री छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिलों में बेरोकटोक जारी है। शासन-प्रशासन इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं है। इस मामले को लेकर कई बार विधानसभा में भी सरकार से प्रश्न पूछे जा चुके हैं, लेकिन सरकार हमेशा इस पर गोलमोल जवाब देकर टाल देती है। सरकार की उदासीनता का ही परिणाम है कि आज यह संख्या 20 हजार का आंकड़ा पार कर चुकी है। सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहींझारखंड और उड़ीसा जैसे गरीब राज्यों के सीमावर्ती गांवों की आदिवासी बालाओं को प्लेसमेंट एजेंसी के नाम पर दलाल सुनहरे भविष्य का सपना दिखाते हैं और उन्हें बड़े शहरों में ले जाकर बेच देते हैं। कई समाजसेवी संगठनों का आरोप है कि ऐसे मामलों में एक ओर तो दूरदराज के क्षेत्रों से पुलिस थाने तक पहुंच पाना आदिवासियों के वश की बात नहीं है और अगर कोई पुलिस तक पहुंच भी जाता है तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने से आनाकानी करती है।
अब फिर एक बार विधानसभा में यह मामला उठा है जो शायद हर बार तरह फिर विधानसभा खत्म होते-होते ठंडा पड़ जाएगा। ये समाज की एक बुराई है, जिसके पीछे दो ही कारण प्रमुख हैं एक तो गरीबी दूसरी सरकार की उदासीनता। भले ही इन दिनों छत्तीसगढ़ में न जाने कहां-कहां से लोग आ रहे हैं और रोजगार पा रहे हैं, पर जो मूल छत्तीसगढ़ी हैं, वे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मजदूरी करते पाए जाते हैं। यह दोहरापन आखिर क्यों? उन्हें अपने ही राज्य में रोजगार क्यों नहीं मिल पाता? क्यों विवश हैं वे और क्यों विवश है सरकार जो उनकी बेटियों को बिकता देखकर भी मौन है। फिर इसमें पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में है कि आखिर क्यों वह इन एंजेसियों पर नजर नहींरखती है। शायद भाजपा सरकार और प्रदेश की पुलिस किसी बड़ी घटना के इंतजार कर रही है। 

                                                                                                         इतवार वीकली में प्रकाशित

Monday, January 30, 2012

राजनीतिक पहचान की जद्दोजहद में अमित जोगी

राहुल गांधी की तर्ज पर कभी किसी सरकारी योजना का विरोध जताकर तो कभी अपने उपर हमला करने वालों को माफ करने को लेकर अमित जोगी इन दिनों चर्चा में बने हुए हैं। चर्चाओं को यूं विस्तार देने के पीछे की उनके मंशा छत्तीसगढ़ में अपने लिए वह राजनीतिक जमीन तलाश करना है जो उनपर लगे आरोपों के चलते उनसे छिन सी गई है। उनके इस काम में उनके मददगार है छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और उनके पिता अजित जोगी।


राजनीति संभावनाओं का खेल है। यहां चीजे हमेशा एक जैसी नही रहती हैं। उतार चढ़ाव आते जाते रहते है पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी के राजनीतिक जीवन में 2003 के बाद जो उतार आया वह अब तक जारी है। एक समय था जब मध्य प्रदेश से अलग हुए आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के नाम का डंका बड़े जोर शोर के साथ बजा करता था। साथ ही उनकी गिनती दस जनपद के खासमखास लोगो में होती थी जहां पर उनका सिक्का बड़ी बेबाकी से चला करता था। यही नही अविभाजित मध्य प्रदेश में रायपुर में अपनी प्रशासनिक दक्षता का जोगी ने लोहा भी मनवाया था। इसी के चलते पार्टी आलाकमान ने जोगी को छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रुपी कांटो का ताज सौंपा। आलाकमान जोगी पर इस कदर भरोसा करता है कि 2003 के आम चुनाव से पहले उनके इकलौते बेटे अमित जोगी का नाम राकपा के महासचिव रामअवतार जग्गी मर्डर केस में आने के बाद भी छत्तीसगढ़ में 2003 के आम चुनाव में पार्टी ने जोगी को ही आगे किया परन्तु उसके हाथ से सत्ता फिसल गई और साथ ही पीछे छूट गया वह रूतबा भी जिसके बलबूते पर जोगी की साख टिकी थी। 2003 के चुनाव परिणाम के बाद भाजपा के जीतने वाले नेताओं को खरीदने और फिर से सत्ता में काबिज होने का सपना देखने वाले जोगी को इस मामले में पकड़े जाने पर कांग्रेस आलाकमान की नाराजगी भी झेलनी पड़ी। पर वह बात आयी गई हो गई। इस बात से इंकार नहींकिया जा सकता है कि आज भी छत्तीसगढ़ में जोगी से ज्यादा शक्तिशाली कांग्रेसी नेता कोई दूसरा नहींहै। यही कारण है कि पार्टी आलाकमान आज भी जोगी को ही प्रदेश में आगे करती रही है और हर बार वहां होने वाले चुनाव में जोगी का ही सिक्का चलता है। इन सबके बावजूद आज भी लोग जोगी के उत्तराधिकारी के रूप में अमित जोगी को नहींदेखते हैं जो अमित के राजनीतिक भविष्य के लिए गहन चिंता का विषय है। शायद इसीलिए अब छोटे जोगी पिता की मदद से समय रहते अपनी राजनीतिक जमीन तलाश लेना चागते हैं।
जब 2003 के चुनावों ने करवट बदली और जोगी के हाथ से सत्ता फिसल गई ठीक इसी समय अमित के सितारे भी गर्दिश में चले गए। एक समय अजित जोगी के उत्तराधिकारी के तौर देखे जाने वाले अमित का नाम राकपा के महासचिव रामअवतार जग्गी की हत्या की साजिश रचने और दिलीप सिंह जूदेव घूस प्रकरण के कारण उनकी खासी किरकिरी हुई। माना जाता है कि जूदेव प्रकरण को हवा देने में अमित जोगी की खासी अहम् भूमिका है। इतना ही नहींइसके बाद मर्डर के सिलसिले में अमित जोगी को जेल की हवा भी खानी पड़ी। 2004 में अजित जोगी एक कार दुर्घटना में घायल हो गए जिसके चलते आज तक वह व्हील चेयर में है परन्तु लचर स्वास्थ्य के बाद भी अभी जोगी का राजनीति से मोह नही छूट है।
जोगी का एक दौर था और उस दौर में वह आदिवासियों के बीच खासे लोकप्रिय थे, पर आज आलम यह है कि छत्तीसगढ़ में चावल वाले बाबा जी यानी डा.रमन सिंह  के मुकाबले जोगी की पूछ परख लगभग मृत्त प्राय है। यही कारण है कि पिछले चुनाव में जोगी ने राज्य के कोने कोने में पार्टी के लिए वोट मांगे थे पर जनता ने उनके नेतृत्व को नकार दिया। यह घटना ये बताने के लिए काफी है कि किस तरह जोगी अपने राज्य के आदिवासियों के बीच ठुकराए जा रहे है, जबकि जोगी खुद को आदिवासियों का बड़ा हिमायती बताया करते थे। 2008 के चुनावो में आदिवासी बाहुल्य इलाको में कांग्रेस को केवल 11 सीट मिल सकी। इसके बाद से लगातार राज्य में कांग्रेस का ग्राफ घटता जा रहा है। एक समय ऐसा भी आया जब खुद अजित जोगी की राजनीति पर संकट पैदा हो गया है। उनको करीब से जाने वाले कहते है वर्तमान दौर में उनकी राजनीति के दिन ढलने लगे थे और अपने राज्य में ही जोगी अपने विरोधियो से पार नही पा रहे थे। पहले जोगी ने 15 वी लोक सभा के चुनावो में अपनी पत्नी डॉक्टर रेनू जोगी को लोक सभा का चुनाव लड़ाया लेकिन वहां पर भी जोगी को मुंह की खानी पड़ी। इसके बाद भी राजनीति के प्रति उनका मोह कम नही हुआ। राज्य सभा के जरिये केंद्र वाली सियासत करने में रूचि दिखाई लेकिन असफलता ही हाथ लगी। जोगी की इन सारी नाकामयाबियों में उनके विरोधियों का बड़ा हाथ रहा जिनमेंंबहुत से विरोधी ऐसे भी थे जो कांग्रेसी हैं पर जोगी के विरोधी भी हैं। इसी के चलते अब कई लोग और कांग्रेस के जानकार यह मानने लगे है अगर समय रहते राज्य में जोगी का विकल्प नही खोजा गया तो राज्य में रमन सिंह तीसरी बार अपनी सरकार बना लेंगे। जोगी को भी अब लगने लगा है कि व्हील चेयर पर वह अपने और पार्टी के नाम पर वोट नहींमांग सकते हैं। शायद तभी वो राज्य में वंशवाद को बढ़ाने में लगे है और इसीलिए अब वह अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने के लिए अमित को तैयार कर रहे हैं। भारतीय राजनीति में वंशवाद से कोई अछूता नही है। फिर जोगी तो उस पार्टी की उपज है जहां सबसे ज्यादा वंशवाद की अमर बेल फैली है। इसकी परछाई जोगी पर स्वाभाविक तौर पर पडऩी ही थी।
अब जोगी यह बात भली भांति जान गए है मौजूदा समय में उनका राज्य में बड़े पैमाने पर सक्रिय हो पाना असंभव लगता है। साथ ही पार्टी आलाकमान भी उनका विकल्प तलाश रही है। प्रदेश राजनीति में उनके विरोधियो ने उनको हाशिये पर धकेल दिया है इस लिहाज से वह अपना खुद का वजूद बचाने में लगे हुए है। इसी बात को जानते और वकत की नजाकत को भांपते हुए अब उन्होंने आदिवासियों का दिल फिर से जीतने का मन बनाया है ताकि आदिवासी इलाको में अपने बेटे अमित के लिए सम्भावना तलाशनी शुरू कर दी है। आदिवासी कार्ड खेलकर वह राज्य में अपने बेटे अमित को जनता के सामने लाकर वह राज्य की राजनीति में अपनी विरासत सौपने की दिशा में जल्द ही कदम बढ़ाकर फैसला ले सकते है। यही कारण है कि इन दिनों राहुल गांधी की तर्ज पर अमित भी कांग्रेस का प्रचार बड़े जोर शोर से कर रहे हैं साथ ही अपने करियर में ऐसे-ऐसे राजनीतिक तड़के लगा रहे कि जैसा कि कोई बड़ा राजनीतिज्ञ करता है।
छोटे जोगी पहली बार बड़ी चर्चा का कारण तब बने जब जून 2011 में उनपर जानलेवा हमला हुआ। मध्यप्रदेश के जबेरा विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी और अपनी बहन तान्या सोलेमन के चुनाव प्रचार के लिए गए छोटे जोगी को कुछ असामाजिक तत्वों ने हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया था। इसके फलस्वरूप उनके सिर पर चोट की वजह से बाई आंख की रोशनी चली गई थी। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के नेत्र अस्पताल के डाक्टरों ने आंख में खून का थक्का जमने से रोशनी का न आना बताया। खून का थक्का साफ होने के बाद धीरे-धीरे आंखों में रोशनी वापस आ सकी।  इस मामाले में पहले तो अमित ने खुद पर हुए हमलों पर भाजपा को कोसते हुए ढेरों बयान बाजी की और जोर शोर से भाजपा नेता विनोद गोटिया और उजियार सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि स्थानीय शासन-प्रशासन की शह पर इन दोनों ने अपने साथियों के सात मिलकर हम पर और हमारे साथियों पर हमला किया जिसके गवाह स्थानीय लोग है। इन लोगों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के लिए छोटे जोगी कृतसंकल्प भी दिखे। पर दिल्ली वापस आकार और चोट का इलाज करवाने के बाद अचानक ही उनका रूख नम्र हो गया। उन्होने गांधी के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि गांधी के सिद्धांतों की सियासत करने वालों को कार्रवाई की बजाय माफी को ज्यादा बड़ा मानना चाहिए। अब अमित हमले के आरोपियों पर कोई कानूनी कार्रवाई करना चाहते हैं। इस घटना में छोटे जोगी ने पहले आग में घी डाला और फिर उसपर थोड़ा सा पानी डालकर उसे धीरे-धीरे सुलगने दिया। राजनीति की थोड़ी सी समझ रखने वाला भी यह बता देगा कि यह पैंतरेबाजी छोटे जोगी को विरासत में मिली है। रणनीति की बिसात पर भले ही आवाज छोटे जोगी की हो पर बैकग्रांउड की आवाज तो सीनियर जोगी की ही है।
छत्तीसगढ़ में भी खबरों में बने रहने के लिए गाहे बगाहे छोटे जोगी कुछ न कुछ ऐसा करते रहते हैं जिससे उनकी चर्चा हो सके। ऐसा ही एक कारनामा उन्होंने जांजगीर चांपा में बन रहे आधुनिक पवार प्लांट का विरोध जता कर किया। उनकी गिरफ्तारी को लेकर पूरे प्रदेश में सरकार के खिलाफ आंदोलन और पुतला दहन किया गया। दरअसल जांजगीर चांपा में बन रहे इस आधुनिक पवार प्लांट से किसानो की सिंचित और कृषि योग्य भूमि को भरी नुकसान होने की बात को लेकर अमित ने यह सारा हंगामा किया था। जिस स्थान पर सरकार की आधुनिक पवार प्लांट स्थापित करने की योजना है वह डोलोमाइट एरिया घोधित है यानी वहां पर खनिज सम्पदा की भरमार है। ऐसी स्थिति में नियमानुसार पवार प्लांट यहां पर स्थापित नहीं किया जा सकता। अमित अपने हजारों साथियों के साथ वहां विरोध प्रदर्शन करने जा रहे थे पर पुलिस ने उन्हें रास्ते में ही रोक लिया औप उनके साथियों समेत उनको बाराद्वार रेस्टहाउस नजर बंद कर दिया। इस बात का फायदा जोगी ने बखूबी उठाया और काफी समय तक मीडिया की नजरे इनायत उनपर बनी रही। इसी तरह पिछले दिनों अमित जोगी ने प्रदेश भाजपा पर संगीन आरोप लगाते हुए यहां तक कह डाला कि बस्तर में ना तो प्राथमिक सुविधाएं हैं और ना ही आदिवासियों के इलाज की व्यवस्था। उनके पास ना तो रोजगार के संसाधन उपलब्ध हैं और ना ही आधारभूत सुविधाएं। ऐसे में वहां ते आदिवासियों में के सामने नक्सली बनने के अलावा और चारा बचता ही नहींहै। गरीबी और अशिक्षा जैसी समस्याएं आज भी मुंह बाए सबके सामने खड़ी है। आज के समय में वे खुद भी अगर बस्तर में पैदा हुए होते तो शायद वे भी नक्सली ही होते। अमित जोगी के इस बयान ने कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रही राजनीतिक गहमागहमी को हवा दे दी है और फिर से बयानों का दौर शुरू होने की संभावना तो बढ़ ही गई है। साथ ही अमित ने एक ऐसा मुद्दा उठाया है जिसकी चर्चा सिर्फ प्रदेश में ही नहींबल्कि उसके बाहर भी काफी समय तक गूंजेगी।
सीनियर जोगी ने अमित को अपना उत्तराधिकारी तो बना लिया पर क्या वह अमित को सत्ता सुख दिला पाने में कामयब होंगे यह प्रश्न सभी के साथ छोटे जोगी को भी परेशान कर रहा है। इसका कारण है आदिवासी वोट बैंक का सीनियर जोगी के हाथों से लगातार फिसलना। पिछले दिनों बलिराम कश्यप के निधन से रिक्त हुई सीट बस्तर की के लिए जोगी ने कांग्रेस के पक्ष में जमकर प्रचार किया था पर फिर भी यह सीट भाजपा के पाले में चली गई। इस हार के बावजूद आदिवासियों की हर सभा में आज भी जोगी की एहमियत कम नही हुई है। आज भी उनकी सभाओं में लोगों की भारी भीड़ उमड़ आती है। अब जोगी की कोशिश है कि इस भीड़ को अमित के पक्ष में किसी भी तरह किया जाए। हत्या कांड में जेल की यात्रा कर चुके अमित अब पिता के पग चिन्हों पर चलकर अपनी छवि बदलने की तैयारियों में जुट गए है। वह इस बात को जानते है चाहे राज्य के कांग्रेसी नेता उनके पिता को आने वाले दिनों में किनारे करने के मूड में है लेकिन पिता आदिवासी इलाके में उनको स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। अजित जोगी भी इस बात को बखूबी जान रहे है। शायद तभी उनकी नजर आदिवासियों के एक बड़े वोट बैंक पर आज भी लगी हुई है। जोगी का सपना और मकसद एक है कि किसी तरह आने वाले विधान सभा चुनाव में अमित को कांग्रेस पार्टी टिकट दे जिससे राज्य में वह उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा सके। इसीलिए छोटे जोगी आदिवासियों को हितचिंतक बन उनके पक्ष में बयान बाजी कर रहे हैं। देखना होगा अजित जोगी का ये दाव छत्तीसगढ़ में कितना कारगर साबित होता है। इस बहाने अजित जोगी जहां अपने बेटे को आगे कर अपनी विरासत को आगे बढ़ाएगे वहीं आदिवासियों के बीच अपनी लोकप्रियता के मद्देनजर अपने बेटे अमित जोगी की राजनीतिक राह आसान कर देंगे। अब यह तो समय ही बताएगा कि उनका यह कदम और छोटे जोगी की पैंतरेबाजियां आने वाले समय में कितना कारगर साबित होती हैं।

Thursday, December 8, 2011

गरीबी के लिए कुछ भी करेगा

भारत में गरीबी रेखा को लेकर जहां काफी बहस हुई और योजना आयोग की रपट की छीछालेदर हुई, वहीं पड़ोसी देश चीन में स्वयं राष्टï्रपति ने ही इसकी नई परिभाषा दी। देश के ग्रामीण इलाकों में गुजर-बसर कर रहे लोगों को अत्यावश्यक जीवन-यापन को प्रतिबद्घ राष्टï्रपति हू जिंतओ ने गरीबी रेखा का स्तर बढ़ा दिया। हालांकि कहा जा रहा है कि हू जिंतओ ने ऐसा अपनी लोक्िरपयता बचाए रखने के लिए किया है, जिससे आने वाले समय में कोई भी उनके लोकप्रियता पर सवाल न खड़ा कर सके। अब चीन में प्रतिदिन एक डॉलर यानी करीब 50 रुपए से कम कमाने वाले व्यक्ति को गरीब माना जाएगा। अभी तक यह रेखा सीमा 55 सेंट पर थी, लेकिन जिसे चीनी सरकार ने 92 फीसदी बढ़ा दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि अब चार गुना अधिक लोग सरकारी सब्सिडी और प्रशिक्षण के दायरे में आएँगे। हू जिंताओ का कहना है कि लोगों के वेतन में बढ़ती असमानता को रोकने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है, वर्ष 2020 तक चीन में किसी को खाने या कपड़ों के बारे में चिंता नहीं करनी पड़ेगी। जानकारों का कहना है कि गरीबों के लिए इस हितकारी फैसले के पीछे चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी है। अगले दो वर्षों में हू जिंताओ के राष्ट्रपति पद से हटने के आसार बताए जा रहे हैं। गद्दी छोडऩे के बाद भी हू जिंताओ चाहते हैं कि उनकी और उनके नज़दीकी राजनेताओं की पैठ बनी रही, वो अब भी चीन में वर्चस्व रखने वाली सेन्ट्रल मिलिट्री कमिशन के अध्यक्ष हैं और इस फैसले से जनता में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते हैं। राजनीतिक प्रेक्षक यह भी कहते हैं कि हू जिंताओ ने अपने वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए ही इस समय यह फैसला लिया है। साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से चीनी सरकार स्थानीय बाज़ार में मांग को बढ़ावा देना चाहती है। गरीब लोगों को सरकारी मदद मिलेगी तो उनके पास आमदनी बढ़ेगी और बाजार में निचले स्तर के सामानों के लिए मांग बढ़ेगी। एक बात और ध्यान रखने लायक है कि चीन की कुल आबादी का 40 फीसदी शहरों में रहता है और 60 फीसदी ग्रामीण इलाकों में। गरीबी रेखा का यह फैसला सिर्फ ग्रामीण इलाकों पर लागू होता है। चीन के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में गरीबी और बेरोजगारी एक बड़ी परेशानी है। हू जिंताओ के सत्ता में आने से पहले चीनी सरकार की नीति दक्षिणी इलाकों पर केन्द्रित थी। गौर करने योग्य बात यह भी है कि गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों को चीन में सब्सिडी, रोजगार के लिए प्रशिक्षण, सस्ती दरों पर कर्ज और ग्रामीण इलाकों में सरकारी मदद से चलनेवाली ढांचागत परियोजनाओं में नौकरी के अवसर मिलेंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में शहरों की ओर लोगों को आना घटेगा। अगर दूर भविष्य पर नजर डालें तो कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो चीन के आर्थिक विकास को धीमा कर सकते हैं। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू ये है कि चीन के तेज आर्थिक विकास की वजह से गाँवों में अपेक्षाकृत कम उत्पादक काम को छोड़कर शहरों की ओर आ रहे थे। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेरी आशनग्रीन चेतावनी देते हैं कि हर तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के विकास की दर का धीमा होना अपरिहार्य है और उन देशों में ये स्थिति जल्दी आ जाती है जहां उम्रदराज लोगों की आबादी बहुत अधिक है। चीन की एक बच्चे की नीति और लोगों औसत उम्र का बढऩा जल्दी ही चीन को इस श्रेणी में ला खड़ा करेगी। वे इस बात से सहमत हैं कि चीन के विकास की दर अब धीमी होगी। ये कहना जरुरी है कि चीन एक बड़ा निर्यातक भी है जो ट्रेड सरप्लस में है। ट्रेड सरप्लस यानी निर्यात से होने वाली उसकी आय आयात में उसके खर्च से अधिक है। लेकिन चीन का आयात लगातार बढ़ रहा है इसलिए ख़ुद वह कई देशों के लिए एक बड़ा बाज़ार बनता जा रहा है। कुछ लोगों को चीन को लेकर संशय भी होता है। भारत की तरह चीन में भी लोग बढ़ती महंगाई से लोग परेशान हैं। चीन के अधिकारी महंगाई को लेकर असुविधाजनक स्थित में जाते जा रहे हैं। हाल ही में कर्ज कम करने के लिए चीन के केंद्रीय बैंक ने कई कदम उठाए हैं। वर्तमान में दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाएं घायल अवस्था में कराह रही हैं और महामंदी के बाद धीरे-धीरे अपने आपको अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रही हैं। पश्चिमी देशों के उपभोक्ता और सरकारें अपने आपको कर्ज से मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। ये दोनों ही आने वाले समय में उपभोक्ता सामग्रियों और सेवाओं के बड़े शक्ति होंगे, ठीक उसी तरह जैसे वे पिछले दशक में थे। दूसरी ओर इसके बिल्कुल विपरीत चीन में मंदी के दौर में गति थोड़ी धीमी पड़ी उसके बाद अर्थव्यवस्था अपनी पूरी रफ्तार से चल पड़ी। वर्ष 2007 से 2011 तक चीन ने इतनी वैश्विक आर्थिक उन्नति की है जितनी जी-7 देशों ने मिलकर भी नहीं की।

Friday, November 11, 2011

सावधानी से चुनें हाली-डे पैकेज

अखबारों और इंटरनेट पर पब्लिश होने वाले हॉलिडे पैकेज टूर के लुभावने एड्स कई बार सैर का मजा किरकिरा भी कर देते हैं। ऐसे में जरूरत होती है संभलकर चलने की, ताकि इसमें किए खर्च को लेकर बाद में पछतावा हो। छुट्टियों में मूड फ्रेश करने और माहौल बदलने के लिए तमाम लोग घमूने जाना पसंद करते हैं। फिलहाल अधिकांश पैरंट्स अपने 'चों के साथ हॉलिडे पर जाने की प्लानिंग कर रहे हैं। ऐसे में कई लोग 'छे हॉलिडे पैकेज की तलाश में हैं। हो सकता है कि आप भी बेस्ट हॉलिडे पैकेज चुनने के लिए रोज अखबारों के पन्ने पलट रहे हों या इंटरनेट छान रहे हों लेकिन किसी भी पैकेज के चुनाव से पहले यह ध्यान रखें कि पैकेज में सब कुछ ठीक ठाक तो है, कोई हिडन कंडिशन तो नहीं है। लुभावनेपैकेजमेंकंडिशंसअप्लाई टूरि' सेक्टर का पीक सीजन शुरू हो चुका है और 'यादातर कंपनियां सस्ते पैकेज का प्रचार कर रही हैं, लेकिन पैकेज के इस खेल में कई पेच हैं, जो पैकेज की पूरी जानकारी लेने के बाद ही सामने आते हैं। अक्सर कंपनियां कस्टमर्स को अपनी ओर खींचने के लिए काफी लुभावने पैकेज देती हैं। लोगों को हॉलिडे पैकेज ऑफर करने वाली कंपनियां कई बार हिडन चाजेर्ज को छिपा लेती हैं और कई बार टैक्स नहीं जोड़तीं। इसीलिए लोग सस्ते पैकेज के बहकावे में जाते हैं। अखबारों में काफी बड़े-बड़े फॉन्ट में लुभावने ऐड दिए जाते हैं, ऐड के नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा होता है कंडिशंस अप्लाई या शर्ते लागू। कई ट्रैवल कंपनियां अपने ऐड में इस बात का खुलासा नहीं करतीं कि पैकेज के लिए दी जाने वाली रकम में खाने और रहने का खर्च शामिल है या नहीं। और तो और पैकेज की रकम में टैक्स भी नहीं जोड़ा जाता जो बाद वसूला जाता है। कंपनियां अपने कम बजट के पैकेज में केवल आने और जाने का किराया ही शामिल करती हैं। इसलिए ऐड के नीचे बारीक शब्दों में लिखे गए शर्ते लागू पर गौर करना निहायत जरूरी है। भ्रामकजानकारी अक्सर टूर कंपनियां अपना टूर प्रोग्राम कस्टमर को दिखाने से बचती हैं। इसका कारण है टूर पैकेज के जरिएभ्रामक जानकारी देकर लोगों को गुमराह करना और अपना पैकेज बेचना। यही कारण है कि टूर प्रोग्राम दिखाएबिना कंपनियां ऐसे पेपर पर साइन करवा लेती है, जिसपर शर्ते लागू लिखा होता है और कस्टमर बिना देखे साइनकरे उनके जाल में फंस जाते हैं। इसी के चलते कंपनियां मनमानी करती हैं। कई बार तो विदेश के टूर पैकेज केदौरान लोगों को काफी सस्ते होटल में ठहरा दिया जाता है, जो घूमने की लोकेशन से काफी दूर भी हो सकता है। ऐसेमें सही यही होगा कि पहले टूर पैकेज के स्टार और शर्ते लागू का सच जाने फिर पैकेज लें। स्टार में छिपा पैकेज इन दिनों ट्रैवल कंपनियों की ओर से सस्ते पैकेज के नाम पर कई विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं। इन पैकेजों में कंपनियां दाम पर स्टार लगाकर नीचे लिख देती है नियम शर्तें लागू जिसपर अक्सर कस्टमर का ध्यान नहींजाता है। पर हकीकत यह है कि पैकेज का असली खर्च कंपनियां इसी स्टार के नीचे छिपा जाती हैं खासकर विदेशी टूर पैकेजो के मामले में। जैसे अखबार में सिंगापुर का चार दिन तीन रात का पैकेज सिर्फ 21,000 रुपए होता है पर सिंगापुर के इस 21 हजार रुपए के पैकेज की असलियत कुछ और ही है। दरअसल पैकेज में कई और खर्चे भी शामिल हैं, जो विज्ञापन में नहीं छापे जाते। वह सभी खर्च मिलाकर उस पैकेज का दाम प्रति व्यक्ति 41 हजार रुपए बैठता, जो काफी ज्यादा है। खेल करेंसी का दरअसल विदेशी पैकेज में तीन करेंसी का खर्च शामिल होता है। पहला भारतीय रुपया, दूसरा अमेरिकी डॉलर और तीसरा उस देश की करेंसी का खर्च, जहां का पैकेज लिया गया है। हां अगर अमेरिका का पैकेज लिया गया है तो तीसरी करेंसी का खर्च शामिल नहीं होता। कंपनियां कंरेसी के इसी खेल के जरिए कस्टमर को बेवकूफ बनाती हैं। अक्सर कंपनियां विज्ञापन में सिर्फ भारतीय रुपए और अमेरिकी डॉलर का ही खर्च बताती हैं। पैकेज में स्थान विशेष की मुद्रा के खर्चे के बारें में कुछ नहींबताया जाता है। इसके अलावा पासपोर्ट चार्ज, वीसा फीस, एयरपोर्ट टैक्स, यात्रा बीमा, मिनरल वाटर, खाना और पानी आदि भी का खर्चा भी इस पैकेज में शामिल नहीं है। यही कारण हैं कि सिंगापुर का 21 हजार का पैकेज 41 हजार रूपए बैठता है। हवाई किराए का खेल कई बार कंपनियां इन पैकेज के प्रचार में सस्ते पैकेज पेश करने दावा करती हैं, लेकिन असल में प्रचार के समय पैकेज का असली खर्च हवाई यात्रा का सच शर्तें लागू या स्टार लगाकर छिपा जाती हैं। अभी हाल में एक टूर कंपनी ने गोवा का 12,000 रुपए का सबसे सस्ता पैकेज देने का दावा किया था, लेकिन उसमें हवाई किराया दिल्ली से होकर मुंबई का था जिसे कंपनी ने जाहिर नहींकिया था। साथ ही पीक सीजन चार्ज, टैक्स आदि भी इसमें शामिल नहीं था। सभी टैक्स, पीक सीजन चार्ज और दिल्ली से हवाई किराया शामिल करने के बाद इस पैकेज की कीमत प्रति पर्यटक 28,000 रुपए हो गई। ऐसे में डिस्कांउट का या सबसे सस्ता टूर पैकेज जैसी कोई बात का मतलब ही नहींरह गया। इस तरह के पैकेज में कैश बैक ऑफर के लिए भी करीब 2-3 महीने पहले बुक करने के साथ पहले पैकेज की पूरी कीमत देनी होती है, तभी ऐसे डिस्काउंट ऑफर का फायदा उठाया जा सकता है। इसलिए इन पैकेजों को लेने से पहले इनमें छिपी कुल लागत को जान लेना जरूरी है। बाक्स प्लानिंग फार परफेक्ट वेकेशन समर वेकेशन्स यानी बिलकुल सही समय, अपने दिमाग को ठंडा और शांत बनाने का। वह भी एक बेहतर हॉलीडे प्लान के साथ। टूर पैकेज का सफर सुहाना और यादगार रहे इसके लिए थोड़ी मशक्कत सफर शुरू करने से पहले ही कर लेनी ठीक होगी- सही पैकेज पैकेज चुनते समय इस बात का खयाल रखें कि आपको होटल, आने-जाने का किराया, खाने का खर्चा अलग से देना पड़े। सभी चीजों के लिए एकमुश्त पैसा जमा करना 'यादा सही होगा। एक आदर्श टूर पैकेज आपके खर्चे को 20-25 फीसदी तक कम कर सकता है। जांचे परखें इन दिनों बहुत-सी कंपनियां समर वेकेशन पैकेज ऑफर दे रही हैं। कोई भी पैकेज लेने से पहले पूरी तरह से जांच-पड़ताल कर लें। सभी नियम शर्ते ध्यान से देख लें। जरूरी नहीं कि कोई एक कंपनी आपको जो सुविधाएं दे रही हो, वैसी ही सुविधाएं दूसरी कंपनी भी दे। ऐसे में पूरी तरह जांच-परख कर ही कोई पैकेज लें। खर्चे की तुलना यह हमेशा जरूरी नहीं होता कि टूर पैकेज लेने से आपको कोई 'यादा छूट मिलती हो। लोग कई बार ट्रेवल एजेंसी के विज्ञापनों से ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा पाते कि इन पैकेज से उन्हें फायदा होगा या नहीं। ऐसे में आप अलग से वहां जाने का खर्चा मालूम करके दोनों की तुलना कर सकती हैं। चूज करें ग्रुप टूर ग्रुप टूर में ट्रेवल एजेंसी या टूर ऑपरेटर आपको सस्ते-से सस्ते विकल्प के बारे में बता सकते हैं। अगर आपकी दिलचस्पी कुछ अलग है जैसे आपको सिर्फ स्त्रियों का साथ चाहिए या हेल्थ टूर, एजुकेशनल टूर या एडवेंचर टूर जैसा कुछ चाहती हैं तो ये सुविधाएं भी आपको मिल सकती हैं। अगर आप अकेले घूमने का लुत्फ उठाना चाहती हैं तो भी अपनी जरूरतों और बजट के हिसाब से सलाह ले सकती हैं। वेबसाइट से मार्गदर्शन होटल की वेबसाइट पर जाएं और कॉस्ट चैक करें। पैकेज में दिए गए होटल के चार्ज की तुलना उसके असल चार्ज से करें। बड़ा आसान-सा तरीका है। ट्रेवल एजेंसी की बहुत-सी साइट्स आपको मिल जाएंगी जिसमें कई तरह के पैकेज मिलेंगे। इससे आपको तुलना करने में भी आसानी होगी और इस नतीजे पर पहुंचना भी आसान होगा कि पैकेज आपके लिए फायदेमंद है या नहीं। सस्ती हवाई यात्रा ऑनलाइन ट्रेवल सर्च इंजन जैसे मेकमायट्रिप डॉट कॉम, क्लिअरट्रिप डॉट कॉम, यात्रा डॉट कॉम आदि चैक करते रहे और कई योजनाओं का फायदा उठाएं। कई बार एक महीना या तीन सप्प्ताह पहले बुक करने पर आपका हवाई सफर सस्ता भी पड़ सकता है। त्योहारों या ऑफ सीजन के समय भी एअर लाइंस टैरिफ कम करने की योजनाएं निकालती रहती हैं। ऐसी सीधे एअरलाइन पोर्टल से संपर्क करना भी 'छा विकल्प है। हकीकत जिस जगह जाना तय किया है उसके बारे में जानकारी हासिल करें। नेट, किताबें और आपके वो करीबी दोस्त जो वहां घूम चुके हैं, उनके अनुभव काम आएंगे। एक लिस्ट तैयार करें, साथ ही पसंद के हिसाब से प्राथमिकताएं भी तय करें। अंत में कहां ठहरना है, कहां-कहां घूमना है, यह सारी प्लानिंग पहले से ही कर लें। अंतिम पलों के लिए कुछ भी नहीं छोड़े। हां एडवेंचर ट्रिप में जरूर लास्ट मिनट डील की जा सकती है।

Wednesday, August 31, 2011

विकास को अवरूद्घ करती बिजली

नीतीश सरकार सूबे में विकास की बात करती है। आए दिन विदेशी प्रतिनिध मंडलों से मीटिंग करके निवेश की बात करती है, उद्योग लगाने की बात करती है, लेकिन गरमी शुरू होते ही बिजली ने भी गच्चा देना शुरू कर दिया है। बिजली की कमी को चलते उद्योग-धंधे कौन लगाएगा और चलेंगे कैसे, यह बड़ा सवाल है बिहार से बाहर रहने वाले लोगों की नजर में राज्य में विकास की बयार बह रही है, मगर बिहार में रहने वाले लोगों को जब झुलसती गरमी में बिजली नहीं मिलने का अंदेशा है तो उनके लिए विकास की बात बेमानी हो जाती है। खुद प्रदेश सरकार भी मानती है कि प्रदेश में बिजली की किल्लत है। अलबत्ता आने वाले वर्षों में इस कमी को पूरा करने का आश्वासन जरूर दिया जाता है। आज का सच यही है कि बिहार में बिजली संकट अपने चरम पर है। प्रदेश सरकार का सीधे तौर पर आरोप है कि केेंद्र सरकार से बिजली खरीदने के लिए हुए करार का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। यही वजह है कि यह संकट कायम है। दूसरी ओर, राज्य के विपक्षी दलों के लोग कहते हैं कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी के कारण ही बिजली-पानी को लेकर समस्या उत्पन्न हो गई है। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के अधिकारियों की मानें तो केेंद्र सेक्टर से राज्य को हर हाल में 1695 मेगावॉट बिजली मिलनी चाहिए। अगर बिजली संयंत्रों में कोई खराबी भी आ जाए, तो भी इसकी भरपाई करनी होती है, लेकिन इस करार का लगातार उल्लंघन होता रहा है। एक अधिकारी का कहना है कि राज्य में ठंड के दिनों में 2,100 से 2,400 मेगावॉट तथा गर्मी के दिनों में 2,500 से 3,000 मेगावॉट बिजली की जरूरत होती है, लेकिन पिछले कुछ समय से केेंद्रीय सेक्टर के तापीय एवं पनबिजली घरों से 700 से 900 मेगावॉट बिजली ही मिल पा रही है। राज्य के ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव भी मानते हैं कि बिजली के मामले में राज्य पूरी तरह केेंद्र पर निर्भर है और केेंद्र सरकार है कि मदद ही नहीं कर रही है। श्री प्रसाद के अनुसार राज्य सरकार ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अब बाजार से बिजली खरीदने का फैसला किया है। राज्य में तापघर लगाने की भी पहल की जा रही है। उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जहां विपक्षी दलों ने बिजली समस्या को प्रमुख मुद्दा बनाया था, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अगले कुछ वर्षों में बिजली संकट के समाधान का वादा किया था। बहरहाल, गर्मी की दस्तक के साथ ही बिजली संकट और बढऩे का अंदेशा है। बिजली संकट को लेकर राज्य के कई इलाकों में लोग सडक़ पर उतरने लगे हैं। बिजली को लेकर पूरे प्रदेश में कोहराम मचा हुआ है। राज्य की राजधानी पटना सहित भोजपुर, नवादा, मुंगेर, दरभंगा और भागलपुर जिलों में बिजली को लेकर लोग सडक़ों पर उतरने लगे हैं, जबकि वहीं राज्य विद्युत बोर्ड ने चरणबद्ध तरीके से सभी इलाकों में बिजली आपूर्ति करने का दावा किया है। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के अध्यक्ष पीके राय के अनुसार, राज्य के सभी इलाकों में चरणबद्ध तरीके से बिजली आपूर्ति करने का निर्देश दे दिया गया है। इसके लिए अधिकारी निगरानी भी कर रही हैं। विद्युत विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो शुरू से ही बिजली के मामले में राज्य पिछड़ा रहा है। वर्ष 2009-10 में राज्य में बिजली की अधिकतम मांग 2,500 मेगावॉट थी तो अधिकतम आपूर्ति 1,508 मेगावॉट थी। वर्ष 2008-09 में अधिकतम मांग 1,900 मेगावॉट थी तो आपूर्ति सिर्फ 1,348 मेगावॉट थी। इसी तरह 2007-08में राज्य के लिए 1,800 मेगावॉट की बिजली आवश्यक थी तो आपूर्ति 1,244 मेगावॉट ही थी। अनुमान है कि वर्ष 2012-13 तक राज्य को 4,000 मेगावॉट बिजली की जरूरत होगी। राज्य विद्युत बोर्ड के प्रवक्ता हरेराम पांडेय कहते हैं कि पिछले एक महीने से केेंद्रीय सेक्टर से विद्युत आपूर्ति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। इस कारण राज्य में विद्युत संकट उत्पन्न हो गया है। दूसरी ओर कहलगांव और कांटी तापघरों में बिजली उत्पादन पूरी तरह ठप है। कोयला और पानी की समस्या तथा तकनीकी कारणों से ताप और पनबिजली घरों की करीब आधा दर्जन इकाइयों में उत्पादन नहीं हो रहा है। बरौनी तापीय विद्युत केेंद्र से सिर्फ 50 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो रहा है। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि केन्द्र सेक्टर से 800 मेगावॉट बिजली मिल रही है, जिसमें से 350 मेगावॉट बिजली अनिवार्य सेवा के तहत है। वर्तमान में पूरा बिहार बिजली संकट से जूझ रहा है। प्रतिदिन किसी न किसी क्षेत्र में बिजली की मांग को लेकर लोग सडक़ पर उतर रहे हैं। इस मामले में सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। पिछले विधानसभा सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्षी सदस्यों द्वारा सदन में हंगामे के बाद ऊर्जा मंत्री ने स्पष्ट किया था कि बिजली संकट के जल्द समाधान का कोई उपाय फिलहाल सरकार के पास नहीं है।

Tuesday, July 26, 2011

राजनीति आड़े आ रही है दिल्ली के विकास में

राजनेता यदि सही मायने में दिल्ली का विकास करना चाहें तो इसका विकास हो जाएगा, बशर्ते सियासतदान उसमें दखल अंदाजी नहीं करें। दिल्ली में 22 किलोमीटर लंबी गंदा नाला बन चुकी यमुना नदी के सफाई के नाम पर जिस प्रकार से करोड़ो रुपये बर्बाद किये जा चुके हैैं, वह दुखद स्थिति है। दुखद इस बात को लेकर नहीं कि करोड़ो रुपये जो किसी न किसी रूप में जनता का था, बर्बाद किया जा चुका हैै बल्कि इसलिए कि करोड़ो रुपये बहाने के बाद भी यमुना का कायाकल्प नहीं हो पाया। आज की तारीख में भी यदि सरकार चाहे और लीडर लोग अपनी वोट बैंक की राजनीति न घुसाएं तो एक भी पैसे की सरकारी मदद लिए बिना पौराणिक यमुना नदी का लंदन की टेम्स नदी की तरह कायाकल्प हो सकता है। दिल्लीवासियों का अपने शहर क ो विश्वस्तरीय बनाने का सपना तब तक हक ीकत में नहीं बदल सकता जबतक यहां वोट की राजनीति होती रहेगी। दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर जैसा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री बार-बार कहती है कि दिल्ली को पेरिस सरीखाा शहर बनाना हैै, बनाने के लिए लीडर और सरकार को दलगत राजनीति से ऊपर उठना होगा और मिलकर काम करना होगा। अनधिकृत कालोनियों और एनक्र ोचमेंट से छुटकारा पाना होगा। मेरी समझ में यमुना को साफ करना बहुत ही आसान काम है। शुद्घि के काम में एक पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा। मेेरी समझ में यमुना के तीन सौ मीटर के आस-पास किसी भी तरह के निर्माण की कोर्ट की बंदिश का औचित्य समझ में नहीं आ रहा है। अहमदाबाद में साबरमती नदी मामले में जैसी पहल गुजरात सरकार ने की हैै, उसी तर्ज पर यमुना के लिए भी दिल्ली में प्रयास होने चाहिए। सिर्फ करोड़ों रुपये बहाने से विकास नहीं होने वाला हैै। एक तरफ सरकारी नीतियां और दूसरी तरफ कई एजेंसियों के घालमेल के कारण यमुना की सफाई उलझ कर रह गई हैै। कितनी हैरत की बात है कि सरकार ने कोर्ट में भी माना है कि पिछले वर्षो के भीतर यमुना की सफाई के लिए उसने तकरीबन 1700 करोड़ रुपये खर्च कर दिये हैं। इसका परिणाम आज तक क्या निकला है ? यह मेरे सामने भी है और आपके सामने भी। बीते दिनों मैंने भी एक अखबार में खबर पढ़ा था कि यमुना नदी की सफाई के नाम पर और 3150 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बन गई हैै। जबकि इस मद में पहले ही करीब 1200 करोड़ रुपये बहाए जा चुके हैं और नतीजा सिफर रहा है। हमारी-आपकी मेहनत की कमाई से जुटाई सरकारी राशि को किस प्रकार से खर्च किया जा रहा हैै, यह आप भी सोंचे और मैं भी। यमुना में प्रदूषण के स्तर की बात की जाए तो दिल्ली के 18 बड़े नाले 3296 मिलियन गैलन मीटर सीवर प्रतिदिन सीधे नदी में गिरते हैं। दिल्ली में यमुना के पानी को ई श्रेणी में रखा गया है, जिसमें नहाना भी बिमारियों को न्यौता देना है। सीवर के अलावा शहर की औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषित पानी भी नदी में गिरता है। यह जानना दिलचस्प है कि वर्ष 1994 से 1999 के बीच दिल्ली सरकार ने सीवर ट्रीटमेंट सुविधा को मजबूत करने के लिए दिल्ली जल बोर्ड को 284.98 करोड़ रुपये का ऋण मुहैया कराया। इसके बाद वर्ष 1999 से 2004 के बीच सरकार ने इसी काम के लिए 598.84 करोड़ रुपये जारी किये लेकिन जल बोर्ड इसमें से 439.60 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया। जबकि दिल्ली राज्य औद्योगिक व बुनियादी विकास ढांचा निगम ने 147.09 करोड़ रुपये खर्च किए। उधर यमुना एक्शन प्लान के तहत दिल्ली को करीब 170 करोड़ रुपये की राशि मुहैया कराई गई। इसके अलावा भी अलग-अलग मदों में काफी राशि खर्च की गई। इतना कुछ खर्च करने के बाद भी यदि सरकार यमुना को साफ नहीं बना पाती तो मैं क्या कहूं।

Tuesday, July 19, 2011

faishan ke sath katamtaal karti theva kala

राजस्थान की पांच सदी पुरानी थवाई कला इतिहास और विरासत के पन्नों से निकल कर अब रिकॉर्ड बनाने की ओर अग्रसर है। एक ही परिवार के कंधों पर इस विरासत को संभालने का जिम्मा है। राजस्थान की थेवा कला भी कमाल की है। एक ही परिवार के सदस्यों को सर्वाधिक राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के लिए लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकाड्र्स -2011 में शामिल होने का गौरव है। प्रतापगढ़ के एकमात्र राज सोनी परिवार को थेवा कला को बचाए रखने और नए स्वरूप में ढालने का सौभाग्य हासिल है। राजस्थान में राज्याश्रय में पलने वाली हस्तकलाओं ने सारे विश्व में अपना डंका बजाया। प्रतापगढ़ प्रदेश की ऐसी ही विश्व प्रसिद्ध कला नगरी है। अखिल भारतीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक गौरव प्राप्त प्रतापगढ़ सिर्फ एक कला के कारण लोगों की निगाहों का केंद्र है। लोग दूरदराज से खास तौर पर थेवा के आभूषण और वस्तुएं लेने प्रतापगढ़ चले आते हैं।राज सोनी परिवार ने आठ राष्ट्रीय और दो राज्य स्तरीय अवार्ड प्राप्त कर अपनी परंपरागत थाती थेवा कला को नए स्वरूप में ढालने का सौभाग्य हासिल किया है। यह अपने आप में अनूठा है कि इन्साइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका में उल्लिखित थेवा कला के मर्मज्ञ सिर्फ प्रतापगढ़ में ही बसते हैं। रामायण में उल्लेख रामायण में जिन 64 कलाओं का उल्लेख है। उनमें वर्णित थवाई कला ही आज की थेवा कला है। कर्नल टॉड और गौरी शंकर ओझा ने भी राजस्थान के इतिहास में इसका उल्लेख किया हैं। 19वीं सदी में हेनर की भारत यात्रा के दौरान थेवा कला से काफी प्रभावित हुए थे। उनके यात्रा वृतांत में भी इसका उल्लेख है। पीढिय़ों की धरोहर सदियों पूर्व मालवा से नाथू सोनी देवगढ़ में आ बसे थे। देवगढ़ तब प्रतापगढ़ रियासत की राजधानी था। कला पारखी राजा ने सोनी परिवार को ‘राज सोनी’ का दर्जा दिया। 1775 में तत्कालीन नरेश सांवतसिंह ने इस परिवार को तीन सौ बीघा जमीन जागीर स्वरूप दी। प्रतापगढ़ में करीब दस पीढिय़ां इसी कला की बदौलत अपना जीवन यापन करती रही हैं। राजकीय संरक्षण के दिनों में राज सोनी परिवार ने इस कला में निखार लाने का प्रयास किया और इससे न सिर्फ प्रतापगढ़ या राजस्थान को ही बल्कि भारत को भी गौरवान्वित करके अनूठी पहचान भी बनाई। बारीक कारीगिरी हाथी, घोड़े, शेर, शिकारी, फूल, पत्ती, राधा-कृष्ण, इतिहास और प्रकृति से जुड़े सैकड़ों विषय जब सोने और कांच की जड़ाऊ नक्काशी के बीच दिखाई देते हैं तो एकबारगी आंखें चुंधिया जाती हैं। लोग थेवा की आकर्षक, कलात्मक वस्तुओं और आभूषणों को देखते हैं तो यह सोच कर दंग रह जाते हैं कि आखिर कांच के भीतर सोने की यह कारीगरी की कैसे जाती है? अब तो थेवा कला में छोटी डिब्बियां, ऐश-ट्रे, इत्रदान, सिगरेटकेस, टाइपिन कफलिंक्स, अंगूठी, बटन, पेंडुलम, पायल, बिछिया, बॉक्स आदि जाने कितनी चीजें बड़े ही कौशल से बनाई जाती हैं। थेवा की रचना प्रक्रिया अनोखी है। सोने, चांदी, कांच और कलाकारी के मिश्रण से बनती हैं थेवा की चीजें। थेवा कला का चित्रकला से गहरा नाता है। इसलिए थेवा कलाकार का चित्रकला में पारंगत होना जरूरी है। परंपरागत चित्रों का अंकन थेवा की खास शैली है। शिकार के विविध पक्ष, रासलीला, पशु-पक्षी, राधाकृष्ण की लीलाएं फूल-पत्तियां, ढोलामारू आदि का सूक्ष्म चित्रांकन नींव के वे पत्थर हैं जो सुंदर थेवा कलाकृति का आधार बनते हैं। सोने के पतले पतर पर सबसे पहले टांकल (कलाकारों की विशिष्ट कलम) से आकृति उकेरी जाती है। पारंपरिक भाषा में इसे कंडारना कहते हैं। कंडारने के लिए टांकली को डंडी के सहारे बहुत हलके हाथ से चलाते हैं और चित्र की खुदाई हो जाती है। कंडारने के बाद आकृति के आसपास से फालतू सोना हटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया को जाली बनाना कहते हैं। डिजाइन चीजों के आधार पर तय किए जाते हैैैं। थेवा कलाकारों ने विभिन्न उपादानों में रासलीला के विभिन्न दृश्यों, महाराणा प्रताप के जीवन चरित्र, शिकार, विवाह आदि की पूरी प्रक्रिया को अपनी कला के जरिए सजीव किया है। चित्र उकेरने और जाली बनाने के लिए यदि सोने के पतर पर सीधे ही काम किया जाए तो उसके टूटने का खतरा रहता है, इसलिए इसे चांदी के फ्रेम में घड़ कर, चांदी की तह से लकड़ी के तख्ते पर राल (गोंद का एक रूप) की मदद से चिपका देते हैं ताकि कलाकार को ठोस आधार मिल सके। ठोस धरातल मिलने पर कंडारने और जाली बनाने में कोई परेशानी नहीं होती। चांदी का फ्रेम और परत भी इसी उद्देश्य से लगाते हैं ताकि सोने की नाजुक और पतली परत सुरक्षित रहे। कलाकार चित्र बनाने में सारा हुनर लगा देता है, क्योंकि आगे चल कर यही वस्तु के सौंदर्य को सही आकार देता है। जाली का डिजाइन बनने के बाद असली प्रक्रिया शुरू होती है। यहां तक का काम तो कोई भी सोनी आसानी से कर सकता है, परंतु जालीदार सोने की परत को कंाच पर फिट करने का काम बहुत सावधानी का होता है। यह प्रक्रिया भी गुप्त है। अब लकड़ी के तख्ते की राल को गरम करके चंादी-सोने के पतर को उतार लेते हैं। एसिड में डुबो कर सोने की परत का इंप्रेशन कांच पर लिया जाता है। कांच बेल्जियम का होता है। इसके बाद गुप्त पद्धति से कांच को सोने और चंादी के फ्रेम के बीच फिट कर दिया जाता है। पंरपरा सिमटा दायरा थेवा कला एक ही परिवार की धाती है। परिवार के सिर्फ पुरुष सदस्य इसे अति गोपनीयता से बनाते हैं। किसी और को बताना या सिखाना तो दूर की बात है, घर की लड़कियों से भी यह कला गुप्त रखी जाती है ताकि शादी के बाद वे इसे ससुराल में न बता दें। इस कला का उद्भव कैसे और कहां से हुआ? आज के संदर्भ में इस प्रश्न का उत्तर सिर्फ इतना ही है कि यह कला करीब 500 वर्ष पुरानी हैै । राज सोनी परिवार के पूर्वज नाथू जी इसके आदि पुरुष थे। आज जब परंपरागत कलाकारों की प्रगति के लिए इतने प्रयास किए जा रहे हैं, तो थेवा कलाकार अपनी परंपरा के दायरे में उलझे हैं, ऐसा क्यों है? यह प्रश्न अपनी जगह सही है, पर राजसोनी परिवार का मानना है कि थेवा उनके लिए थाती है, धरोहर है। उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं है कि वे परंपरावादी हैं। इसी कला ने तो राजसोनी परिवार को विश्व के नक्शे पर खास पहचान दी है। उनके परिवार के प्राय: सभी लोगों को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिले हैं। उनके लिए यह कम गौरव की बात नहीं है कि लोग प्रतापगढ़ को थेवा या उनके परिवार के नाम से पहचानते हैं। थेवा से बने सामान में सबसे ज्यादा टाप्स और लॉकेट बिकते हैं। वैसे नेकलेस, टॉप्स और अंगूठी का सेट भी लोग पसंद करते हैं। डिब्बियां भी ज्यादा बिकती हैं। एक सेट में करीब 17 ग्राम सोना लगता है और यह सोने की कीमत के हिसाब से बिक जाता है। थेवा कलाकार जब बेचने के हिसाब से माल बनाते हैं तो छोटे आइटम ज्यादा बनाते हैं। पुरस्कार वगैरा या फिर ऑर्डर पर बड़े आइटम भी बनाते हैं। बड़ी चीजों मे मंजे हुए कलाकारों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए बड़े आइटम खास मौके पर ही बनते हैं। आज हर क्षेत्र में नई तकनीक और नए औजार आ गए हैं, परंतु थेवा कलाकारों के कामकाज में बदलाव नहीं आया है। औजार वही हैं, चीजें वही हैं, हां, ग्राहक जरूर बदले हैं। पहले राजा-महाराजा ग्राहक थे, अब सेठ-साहूकार या सरकार। पहले माल तौल से बिकता था, अब नग के हिसाब से। झलाई का काम पहले कोयले की सिगड़ी पर होता था अब खास तरीके के स्टोव पर। अब साधारण लोग भी थेवा के जेवर खरीदने लगे हैं, क्योंकि इनमें नाममात्र का सोना होता है। इसलिए हर हाल में कीमत कुछ कम हो जाती है। थेवा कलाकार इसीलिए सारा माल सोने का नहीं बनाते हैं। ऊपर सोना और नीचे चांदी लगाते हैं ताकि आम आदमी ले सके, पर यदि कोई कहे तो सारा कुछ सोने से भी बनाते हैं। सोने की कीमतों में बढ़ोतरी से थेवा कलाकारों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग सकता है, परंतु कलाकारों का मानना है कि भविष्य बहुत अच्छा है। यदि सोना महंगा होता है तो कम सोने में बने होने के कारण थेवा के आभूषण बहुत ही लोकप्रिय होंगे। पहले के मुकाबले थेवा के माल की खपत बहुत बढ़ी है। पर सवाल यही है कि विरासत को क्या सिर्फ एक परिवार का धाती बनाकर रखना सही है। अगर राज सोनी परिवार ऐसा न करता तो शायद यह कला किसी और बुलंदी पर होती।

नीलम