भारत में गरीबी रेखा को लेकर जहां काफी बहस हुई और योजना आयोग की रपट की छीछालेदर हुई, वहीं पड़ोसी देश चीन में स्वयं राष्टï्रपति ने ही इसकी नई परिभाषा दी। देश के ग्रामीण इलाकों में गुजर-बसर कर रहे लोगों को अत्यावश्यक जीवन-यापन को प्रतिबद्घ राष्टï्रपति हू जिंतओ ने गरीबी रेखा का स्तर बढ़ा दिया। हालांकि कहा जा रहा है कि हू जिंतओ ने ऐसा अपनी लोक्िरपयता बचाए रखने के लिए किया है, जिससे आने वाले समय में कोई भी उनके लोकप्रियता पर सवाल न खड़ा कर सके। अब चीन में प्रतिदिन एक डॉलर यानी करीब 50 रुपए से कम कमाने वाले व्यक्ति को गरीब माना जाएगा। अभी तक यह रेखा सीमा 55 सेंट पर थी, लेकिन जिसे चीनी सरकार ने 92 फीसदी बढ़ा दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि अब चार गुना अधिक लोग सरकारी सब्सिडी और प्रशिक्षण के दायरे में आएँगे। हू जिंताओ का कहना है कि लोगों के वेतन में बढ़ती असमानता को रोकने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है, वर्ष 2020 तक चीन में किसी को खाने या कपड़ों के बारे में चिंता नहीं करनी पड़ेगी। जानकारों का कहना है कि गरीबों के लिए इस हितकारी फैसले के पीछे चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी है। अगले दो वर्षों में हू जिंताओ के राष्ट्रपति पद से हटने के आसार बताए जा रहे हैं। गद्दी छोडऩे के बाद भी हू जिंताओ चाहते हैं कि उनकी और उनके नज़दीकी राजनेताओं की पैठ बनी रही, वो अब भी चीन में वर्चस्व रखने वाली सेन्ट्रल मिलिट्री कमिशन के अध्यक्ष हैं और इस फैसले से जनता में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते हैं। राजनीतिक प्रेक्षक यह भी कहते हैं कि हू जिंताओ ने अपने वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए ही इस समय यह फैसला लिया है। साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से चीनी सरकार स्थानीय बाज़ार में मांग को बढ़ावा देना चाहती है। गरीब लोगों को सरकारी मदद मिलेगी तो उनके पास आमदनी बढ़ेगी और बाजार में निचले स्तर के सामानों के लिए मांग बढ़ेगी। एक बात और ध्यान रखने लायक है कि चीन की कुल आबादी का 40 फीसदी शहरों में रहता है और 60 फीसदी ग्रामीण इलाकों में। गरीबी रेखा का यह फैसला सिर्फ ग्रामीण इलाकों पर लागू होता है। चीन के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में गरीबी और बेरोजगारी एक बड़ी परेशानी है। हू जिंताओ के सत्ता में आने से पहले चीनी सरकार की नीति दक्षिणी इलाकों पर केन्द्रित थी। गौर करने योग्य बात यह भी है कि गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों को चीन में सब्सिडी, रोजगार के लिए प्रशिक्षण, सस्ती दरों पर कर्ज और ग्रामीण इलाकों में सरकारी मदद से चलनेवाली ढांचागत परियोजनाओं में नौकरी के अवसर मिलेंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में शहरों की ओर लोगों को आना घटेगा। अगर दूर भविष्य पर नजर डालें तो कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो चीन के आर्थिक विकास को धीमा कर सकते हैं। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू ये है कि चीन के तेज आर्थिक विकास की वजह से गाँवों में अपेक्षाकृत कम उत्पादक काम को छोड़कर शहरों की ओर आ रहे थे। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेरी आशनग्रीन चेतावनी देते हैं कि हर तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के विकास की दर का धीमा होना अपरिहार्य है और उन देशों में ये स्थिति जल्दी आ जाती है जहां उम्रदराज लोगों की आबादी बहुत अधिक है। चीन की एक बच्चे की नीति और लोगों औसत उम्र का बढऩा जल्दी ही चीन को इस श्रेणी में ला खड़ा करेगी। वे इस बात से सहमत हैं कि चीन के विकास की दर अब धीमी होगी। ये कहना जरुरी है कि चीन एक बड़ा निर्यातक भी है जो ट्रेड सरप्लस में है। ट्रेड सरप्लस यानी निर्यात से होने वाली उसकी आय आयात में उसके खर्च से अधिक है। लेकिन चीन का आयात लगातार बढ़ रहा है इसलिए ख़ुद वह कई देशों के लिए एक बड़ा बाज़ार बनता जा रहा है। कुछ लोगों को चीन को लेकर संशय भी होता है। भारत की तरह चीन में भी लोग बढ़ती महंगाई से लोग परेशान हैं। चीन के अधिकारी महंगाई को लेकर असुविधाजनक स्थित में जाते जा रहे हैं। हाल ही में कर्ज कम करने के लिए चीन के केंद्रीय बैंक ने कई कदम उठाए हैं। वर्तमान में दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाएं घायल अवस्था में कराह रही हैं और महामंदी के बाद धीरे-धीरे अपने आपको अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रही हैं। पश्चिमी देशों के उपभोक्ता और सरकारें अपने आपको कर्ज से मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। ये दोनों ही आने वाले समय में उपभोक्ता सामग्रियों और सेवाओं के बड़े शक्ति होंगे, ठीक उसी तरह जैसे वे पिछले दशक में थे। दूसरी ओर इसके बिल्कुल विपरीत चीन में मंदी के दौर में गति थोड़ी धीमी पड़ी उसके बाद अर्थव्यवस्था अपनी पूरी रफ्तार से चल पड़ी। वर्ष 2007 से 2011 तक चीन ने इतनी वैश्विक आर्थिक उन्नति की है जितनी जी-7 देशों ने मिलकर भी नहीं की।
Thursday, December 8, 2011
Friday, November 11, 2011
सावधानी से चुनें हाली-डे पैकेज
अखबारों और इंटरनेट पर पब्लिश होने वाले हॉलिडे पैकेज टूर के लुभावने एड्स कई बार सैर का मजा किरकिरा भी कर देते हैं। ऐसे में जरूरत होती है संभलकर चलने की, ताकि इसमें किए खर्च को लेकर बाद में पछतावा न हो।
छुट्टियों में मूड फ्रेश करने और माहौल बदलने के लिए तमाम लोग घमूने जाना पसंद करते हैं। फिलहाल अधिकांश पैरंट्स अपने ब'चों के साथ हॉलिडे पर जाने की प्लानिंग कर रहे हैं। ऐसे में कई लोग अ'छे हॉलिडे पैकेज की तलाश में हैं। हो सकता है कि आप भी बेस्ट हॉलिडे पैकेज चुनने के लिए रोज अखबारों के पन्ने पलट रहे हों या इंटरनेट छान रहे हों लेकिन किसी भी पैकेज के चुनाव से पहले यह ध्यान रखें कि पैकेज में सब कुछ ठीक ठाक तो है, कोई हिडन कंडिशन तो नहीं है।
लुभावनेपैकेजमेंकंडिशंसअप्लाई
टूरि'म सेक्टर का पीक सीजन शुरू हो चुका है और 'यादातर कंपनियां सस्ते पैकेज का प्रचार कर रही हैं, लेकिन पैकेज के इस खेल में कई पेच हैं, जो पैकेज की पूरी जानकारी लेने के बाद ही सामने आते हैं। अक्सर कंपनियां कस्टमर्स को अपनी ओर खींचने के लिए काफी लुभावने पैकेज देती हैं। लोगों को हॉलिडे पैकेज ऑफर करने वाली कंपनियां कई बार हिडन चाजेर्ज को छिपा लेती हैं और कई बार टैक्स नहीं जोड़तीं। इसीलिए लोग सस्ते पैकेज के बहकावे में आ जाते हैं। अखबारों में काफी बड़े-बड़े फॉन्ट में लुभावने ऐड दिए जाते हैं, ऐड के नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा होता है कंडिशंस अप्लाई या शर्ते लागू। कई ट्रैवल कंपनियां अपने ऐड में इस बात का खुलासा नहीं करतीं कि पैकेज के लिए दी जाने वाली रकम में खाने और रहने का खर्च शामिल है या नहीं। और तो और पैकेज की रकम में टैक्स भी नहीं जोड़ा जाता जो बाद वसूला जाता है। कंपनियां अपने कम बजट के पैकेज में केवल आने और जाने का किराया ही शामिल करती हैं। इसलिए ऐड के नीचे बारीक शब्दों में लिखे गए शर्ते लागू पर गौर करना निहायत जरूरी है।
भ्रामकजानकारी
अक्सर टूर कंपनियां अपना टूर प्रोग्राम कस्टमर को दिखाने से बचती हैं। इसका कारण है टूर पैकेज के जरिएभ्रामक जानकारी देकर लोगों को गुमराह करना और अपना पैकेज बेचना। यही कारण है कि टूर प्रोग्राम दिखाएबिना कंपनियां ऐसे पेपर पर साइन करवा लेती है, जिसपर शर्ते लागू लिखा होता है और कस्टमर बिना देखे साइनकरे उनके जाल में फंस जाते हैं। इसी के चलते कंपनियां मनमानी करती हैं। कई बार तो विदेश के टूर पैकेज केदौरान लोगों को काफी सस्ते होटल में ठहरा दिया जाता है, जो घूमने की लोकेशन से काफी दूर भी हो सकता है। ऐसेमें सही यही होगा कि पहले टूर पैकेज के स्टार और शर्ते लागू का सच जाने फिर पैकेज लें।
स्टार में छिपा पैकेज
इन दिनों ट्रैवल कंपनियों की ओर से सस्ते पैकेज के नाम पर कई विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं। इन पैकेजों में कंपनियां दाम पर स्टार लगाकर नीचे लिख देती है नियम व शर्तें लागू जिसपर अक्सर कस्टमर का ध्यान नहींजाता है। पर हकीकत यह है कि पैकेज का असली खर्च कंपनियां इसी स्टार के नीचे छिपा जाती हैं खासकर विदेशी टूर पैकेजो के मामले में। जैसे अखबार में सिंगापुर का चार दिन तीन रात का पैकेज सिर्फ 21,000 रुपए होता है पर सिंगापुर के इस 21 हजार रुपए के पैकेज की असलियत कुछ और ही है। दरअसल पैकेज में कई और खर्चे भी शामिल हैं, जो विज्ञापन में नहीं छापे जाते। वह सभी खर्च मिलाकर उस पैकेज का दाम प्रति व्यक्ति 41 हजार रुपए बैठता, जो काफी ज्यादा है।
खेल करेंसी का
दरअसल विदेशी पैकेज में तीन करेंसी का खर्च शामिल होता है। पहला भारतीय रुपया, दूसरा अमेरिकी डॉलर और तीसरा उस देश की करेंसी का खर्च, जहां का पैकेज लिया गया है। हां अगर अमेरिका का पैकेज लिया गया है तो तीसरी करेंसी का खर्च शामिल नहीं होता। कंपनियां कंरेसी के इसी खेल के जरिए कस्टमर को बेवकूफ बनाती हैं। अक्सर कंपनियां विज्ञापन में सिर्फ भारतीय रुपए और अमेरिकी डॉलर का ही खर्च बताती हैं। पैकेज में स्थान विशेष की मुद्रा के खर्चे के बारें में कुछ नहींबताया जाता है। इसके अलावा पासपोर्ट चार्ज, वीसा फीस, एयरपोर्ट टैक्स, यात्रा बीमा, मिनरल वाटर, खाना और पानी आदि भी का खर्चा भी इस पैकेज में शामिल नहीं है। यही कारण हैं कि सिंगापुर का 21 हजार का पैकेज 41 हजार रूपए बैठता है।
हवाई किराए का खेल
कई बार कंपनियां इन पैकेज के प्रचार में सस्ते पैकेज पेश करने दावा करती हैं, लेकिन असल में प्रचार के समय पैकेज का असली खर्च व हवाई यात्रा का सच शर्तें लागू या स्टार लगाकर छिपा जाती हैं। अभी हाल में एक टूर कंपनी ने गोवा का 12,000 रुपए का सबसे सस्ता पैकेज देने का दावा किया था, लेकिन उसमें हवाई किराया दिल्ली से न होकर मुंबई का था जिसे कंपनी ने जाहिर नहींकिया था। साथ ही पीक सीजन चार्ज, टैक्स आदि भी इसमें शामिल नहीं था। सभी टैक्स, पीक सीजन चार्ज और दिल्ली से हवाई किराया शामिल करने के बाद इस पैकेज की कीमत प्रति पर्यटक 28,000 रुपए हो गई। ऐसे में डिस्कांउट का या सबसे सस्ता टूर पैकेज जैसी कोई बात का मतलब ही नहींरह गया। इस तरह के पैकेज में कैश बैक ऑफर के लिए भी करीब 2-3 महीने पहले बुक करने के साथ पहले पैकेज की पूरी कीमत देनी होती है, तभी ऐसे डिस्काउंट ऑफर का फायदा उठाया जा सकता है। इसलिए इन पैकेजों को लेने से पहले इनमें छिपी कुल लागत को जान लेना जरूरी है।
बाक्स
प्लानिंग फार ए परफेक्ट वेकेशन
समर वेकेशन्स यानी बिलकुल सही समय, अपने दिमाग को ठंडा और शांत बनाने का। वह भी एक बेहतर हॉलीडे प्लान के साथ। टूर पैकेज का सफर सुहाना और यादगार रहे इसके लिए थोड़ी मशक्कत सफर शुरू करने से पहले ही कर लेनी ठीक होगी-
सही पैकेज
पैकेज चुनते समय इस बात का खयाल रखें कि आपको होटल, आने-जाने का किराया, खाने का खर्चा अलग से न देना पड़े। सभी चीजों के लिए एकमुश्त पैसा जमा करना 'यादा सही होगा। एक आदर्श टूर पैकेज आपके खर्चे को 20-25 फीसदी तक कम कर सकता है।
जांचे परखें
इन दिनों बहुत-सी कंपनियां समर वेकेशन पैकेज ऑफर दे रही हैं। कोई भी पैकेज लेने से पहले पूरी तरह से जांच-पड़ताल कर लें। सभी नियम व शर्ते ध्यान से देख लें। जरूरी नहीं कि कोई एक कंपनी आपको जो सुविधाएं दे रही हो, वैसी ही सुविधाएं दूसरी कंपनी भी दे। ऐसे में पूरी तरह जांच-परख कर ही कोई पैकेज लें।
खर्चे की तुलना
यह हमेशा जरूरी नहीं होता कि टूर पैकेज लेने से आपको कोई 'यादा छूट मिलती हो। लोग कई बार ट्रेवल एजेंसी के विज्ञापनों से ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा पाते कि इन पैकेज से उन्हें फायदा होगा या नहीं। ऐसे में आप अलग से वहां जाने का खर्चा मालूम करके दोनों की तुलना कर सकती हैं।
चूज करें ग्रुप टूर
ग्रुप टूर में ट्रेवल एजेंसी या टूर ऑपरेटर आपको सस्ते-से सस्ते विकल्प के बारे में बता सकते हैं। अगर आपकी दिलचस्पी कुछ अलग है जैसे आपको सिर्फ स्त्रियों का साथ चाहिए या हेल्थ टूर, एजुकेशनल टूर या एडवेंचर टूर जैसा कुछ चाहती हैं तो ये सुविधाएं भी आपको मिल सकती हैं। अगर आप अकेले घूमने का लुत्फ उठाना चाहती हैं तो भी अपनी जरूरतों और बजट के हिसाब से सलाह ले सकती हैं।
वेबसाइट से मार्गदर्शन
होटल की वेबसाइट पर जाएं और कॉस्ट चैक करें। पैकेज में दिए गए होटल के चार्ज की तुलना उसके असल चार्ज से करें। बड़ा आसान-सा तरीका है। ट्रेवल एजेंसी की बहुत-सी साइट्स आपको मिल जाएंगी जिसमें कई तरह के पैकेज मिलेंगे। इससे आपको तुलना करने में भी आसानी होगी और इस नतीजे पर पहुंचना भी आसान होगा कि पैकेज आपके लिए फायदेमंद है या नहीं।
सस्ती हवाई यात्रा
ऑनलाइन ट्रेवल सर्च इंजन जैसे मेकमायट्रिप डॉट कॉम, क्लिअरट्रिप डॉट कॉम, यात्रा डॉट कॉम आदि चैक करते रहे और कई योजनाओं का फायदा उठाएं। कई बार एक महीना या तीन सप्प्ताह पहले बुक करने पर आपका हवाई सफर सस्ता भी पड़ सकता है। त्योहारों या ऑफ सीजन के समय भी एअर लाइंस टैरिफ कम करने की योजनाएं निकालती रहती हैं। ऐसी सीधे एअरलाइन पोर्टल से संपर्क करना भी अ'छा विकल्प है।
हकीकत
जिस जगह जाना तय किया है उसके बारे में जानकारी हासिल करें। नेट, किताबें और आपके वो करीबी दोस्त जो वहां घूम चुके हैं, उनके अनुभव काम आएंगे। एक लिस्ट तैयार करें, साथ ही पसंद के हिसाब से प्राथमिकताएं भी तय करें।
अंत में कहां ठहरना है, कहां-कहां घूमना है, यह सारी प्लानिंग पहले से ही कर लें। अंतिम पलों के लिए कुछ भी नहीं छोड़े। हां एडवेंचर ट्रिप में जरूर लास्ट मिनट डील की जा सकती है।Posted by नीलम at 2:30 AM 2 comments
Wednesday, August 31, 2011
विकास को अवरूद्घ करती बिजली
नीतीश सरकार सूबे में विकास की बात करती है। आए दिन विदेशी प्रतिनिध मंडलों से मीटिंग करके निवेश की बात करती है, उद्योग लगाने की बात करती है, लेकिन गरमी शुरू होते ही बिजली ने भी गच्चा देना शुरू कर दिया है। बिजली की कमी को चलते उद्योग-धंधे कौन लगाएगा और चलेंगे कैसे, यह बड़ा सवाल है बिहार से बाहर रहने वाले लोगों की नजर में राज्य में विकास की बयार बह रही है, मगर बिहार में रहने वाले लोगों को जब झुलसती गरमी में बिजली नहीं मिलने का अंदेशा है तो उनके लिए विकास की बात बेमानी हो जाती है। खुद प्रदेश सरकार भी मानती है कि प्रदेश में बिजली की किल्लत है। अलबत्ता आने वाले वर्षों में इस कमी को पूरा करने का आश्वासन जरूर दिया जाता है। आज का सच यही है कि बिहार में बिजली संकट अपने चरम पर है। प्रदेश सरकार का सीधे तौर पर आरोप है कि केेंद्र सरकार से बिजली खरीदने के लिए हुए करार का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। यही वजह है कि यह संकट कायम है। दूसरी ओर, राज्य के विपक्षी दलों के लोग कहते हैं कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी के कारण ही बिजली-पानी को लेकर समस्या उत्पन्न हो गई है। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के अधिकारियों की मानें तो केेंद्र सेक्टर से राज्य को हर हाल में 1695 मेगावॉट बिजली मिलनी चाहिए। अगर बिजली संयंत्रों में कोई खराबी भी आ जाए, तो भी इसकी भरपाई करनी होती है, लेकिन इस करार का लगातार उल्लंघन होता रहा है। एक अधिकारी का कहना है कि राज्य में ठंड के दिनों में 2,100 से 2,400 मेगावॉट तथा गर्मी के दिनों में 2,500 से 3,000 मेगावॉट बिजली की जरूरत होती है, लेकिन पिछले कुछ समय से केेंद्रीय सेक्टर के तापीय एवं पनबिजली घरों से 700 से 900 मेगावॉट बिजली ही मिल पा रही है। राज्य के ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव भी मानते हैं कि बिजली के मामले में राज्य पूरी तरह केेंद्र पर निर्भर है और केेंद्र सरकार है कि मदद ही नहीं कर रही है। श्री प्रसाद के अनुसार राज्य सरकार ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अब बाजार से बिजली खरीदने का फैसला किया है। राज्य में तापघर लगाने की भी पहल की जा रही है। उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जहां विपक्षी दलों ने बिजली समस्या को प्रमुख मुद्दा बनाया था, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अगले कुछ वर्षों में बिजली संकट के समाधान का वादा किया था। बहरहाल, गर्मी की दस्तक के साथ ही बिजली संकट और बढऩे का अंदेशा है। बिजली संकट को लेकर राज्य के कई इलाकों में लोग सडक़ पर उतरने लगे हैं। बिजली को लेकर पूरे प्रदेश में कोहराम मचा हुआ है। राज्य की राजधानी पटना सहित भोजपुर, नवादा, मुंगेर, दरभंगा और भागलपुर जिलों में बिजली को लेकर लोग सडक़ों पर उतरने लगे हैं, जबकि वहीं राज्य विद्युत बोर्ड ने चरणबद्ध तरीके से सभी इलाकों में बिजली आपूर्ति करने का दावा किया है। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के अध्यक्ष पीके राय के अनुसार, राज्य के सभी इलाकों में चरणबद्ध तरीके से बिजली आपूर्ति करने का निर्देश दे दिया गया है। इसके लिए अधिकारी निगरानी भी कर रही हैं। विद्युत विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो शुरू से ही बिजली के मामले में राज्य पिछड़ा रहा है। वर्ष 2009-10 में राज्य में बिजली की अधिकतम मांग 2,500 मेगावॉट थी तो अधिकतम आपूर्ति 1,508 मेगावॉट थी। वर्ष 2008-09 में अधिकतम मांग 1,900 मेगावॉट थी तो आपूर्ति सिर्फ 1,348 मेगावॉट थी। इसी तरह 2007-08में राज्य के लिए 1,800 मेगावॉट की बिजली आवश्यक थी तो आपूर्ति 1,244 मेगावॉट ही थी। अनुमान है कि वर्ष 2012-13 तक राज्य को 4,000 मेगावॉट बिजली की जरूरत होगी। राज्य विद्युत बोर्ड के प्रवक्ता हरेराम पांडेय कहते हैं कि पिछले एक महीने से केेंद्रीय सेक्टर से विद्युत आपूर्ति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। इस कारण राज्य में विद्युत संकट उत्पन्न हो गया है। दूसरी ओर कहलगांव और कांटी तापघरों में बिजली उत्पादन पूरी तरह ठप है। कोयला और पानी की समस्या तथा तकनीकी कारणों से ताप और पनबिजली घरों की करीब आधा दर्जन इकाइयों में उत्पादन नहीं हो रहा है। बरौनी तापीय विद्युत केेंद्र से सिर्फ 50 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो रहा है। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि केन्द्र सेक्टर से 800 मेगावॉट बिजली मिल रही है, जिसमें से 350 मेगावॉट बिजली अनिवार्य सेवा के तहत है। वर्तमान में पूरा बिहार बिजली संकट से जूझ रहा है। प्रतिदिन किसी न किसी क्षेत्र में बिजली की मांग को लेकर लोग सडक़ पर उतर रहे हैं। इस मामले में सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। पिछले विधानसभा सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्षी सदस्यों द्वारा सदन में हंगामे के बाद ऊर्जा मंत्री ने स्पष्ट किया था कि बिजली संकट के जल्द समाधान का कोई उपाय फिलहाल सरकार के पास नहीं है।
Posted by सुभाष चन्द्र at 12:07 PM 1 comments
Labels: बिहार बिजली संकट