तमाम आशंकाओं का पटाक्षेप करते हुए चुनाव आयोग ने देश के सबसे अधिक राजनीतिक रूप से सशक्त राज्य बिहार में चुनाव के तारीखों की घोषणा करके सियासी घमासान की औपचारिक शुरूआत कर दी। छह चरणों में होने वाला चुनाव की घोषणा चुनाव आयोग के मुख्य आयुक्त कुरैशी ने 6 सितंबर को की। हालांकि सियासी दलों को इस बात का आभास नहीं था कि चुनाव छह चरणों में होगा, वह भी त्योहारों के बीच में। बिहार के मुख्य त्योहार छठ दिन चुनाव की तारीख को लेकर जदयू सहित राजद और लोजपा को संशय है, वह चरण को लेकर नीतिश सरकार को किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं है। आयोग का तर्क है कि चूंकि प्रदेश में नक्सलवादी गतिविधि बढ़ी है, इसके चलते शांतिपूर्ण मतदान के लिए यह आवश्यक है। अब राजनीतिक दल अपने-अपने सियासी गणित को साधने में लगे हैं। बहरहाल, चुनाव आयोग के तयशुदा कार्यक्रम के तहत पहले चरण में 21 अक्टूबर को मतदान होगा। पहले चरण में 47 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे। जबकि दूसरे चरण का मतदान 25 अक्टूबर को होगा और दूसरे चरण में 47 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे। 28 अक्टूबर को तीसरे चरण का मतदान होगा जिसमें 48 सीटों, 1 नवंबर को 42, नौ नवंबर को 35 सीटों के लिए तथा 20 नवंबर को 26 सीटों के लिए मतदान होगा। कुल 243 सीटों के लिए मतदान के बाद 24 नवंबर को मतगणना की जाएगी। दिल्ली में जैसे ही बिहार के लिए चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा की गई, पटना में चुनावी चाल तैयार किए जाने लगे। कुल 243 सीटों वाले बिहार विधानसभा का चुनाव छह चरणों तक खींचे जाने का अनुमान न तो नेताओं को था और न ही सूबे के नौकरशाहों को। नेता छह चरणों में चुनावों की घोषणा का तो इस्तेकबाल कर रहे हैं, लेकिन दशहरा, दिवाली और बिहार का सबसे पावन पर्व छठ के बीच चुनाव की घोषणा को वे गलत करार दे रहे हैं। चुनावों के बरक्स आयोग की घोषणा के साथ ही विभिन्न दलों के नेताओं ने छठ के ठीक पहले पांचवें चरण के चुनाव की तारीख में तब्दीली करने की मांग कर दी है। सूर्य की उपासना का पर्व छठ नहाय खाय, खरना और सूर्य को एक दिन शाम को और दूसरे दिन सूर्योदय के समय अघ्र्य के साथ तीन दिनों में संपन्न होता है। काबिलेगौर है कि व्रत की तैयारी हफ्ते भर पहले से चलती है इस बीच माना जा रहा है कि विभिन्न दलों के प्रत्याशी चुनाव प्रचार नहीं करने के स्थिति में रहेंगे। जदयू अध्यक्ष शरद यादव का कहना है कि चुनाव आयोग को छठ के ठीक पहले पांचवें चरण के चुनाव की तारीख बदलनी चाहिए। बिहार में छठ पर्व की महत्ता को देखते हुए 9 नवंबर को पांचवें चरण का चुनाव कराना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं।Ó 5 नवंबर को दिवाली के छह दिनों के बाद छठ का पर्व होने के कारण तारीख आती है 11 नवंबर। माना जा रहा है कि व्रत का त्योहार तीन दिनों तक चलने का स्पष्ट असर चुनाव प्रचार पर पड़ेगा। ज्यादातर प्रत्याशियों को इस बात की भी चिंता सता रही है कि चुनावों के बीच आने वाले पर्व के कारण वोटरों तक अपनी बात असरदार तरीके से कैसे पहुंचाई जाए! राजद, लोजपा, भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं ने अलग-अलग बातचीत में स्वीकार किया कि कुछ चुनाव की कुछ तारीखों पर आयोग से बातचीत कर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जाएगी। औसतन हर चरण में 40 सीटों पर चुनाव की तैयारी आयोग ने की है। गौरतलब है कि एस.वाई. कुरैशी के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव होगा। चुनाव आयोग राज्य का पहले ही दौरा कर चुका है और वहां चुनाव की तैयारियों खासकर फोटो पहचान पत्र और मतदाता सूची के संशोधन कार्यो का जायजा ले चुका है। चुनाव की तैयारियों को अंतिम रूप देते हुए चुनाव आयोग ने पिछले दिनों केंद्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लई के साथ सुरक्षा इंतजामों पर चर्चा की थी। पिछली बार यानी वर्ष 2005 में बिहार विधानसभा के चुनाव चार चरणों में कराए गए थे, जबकि 2000 के विधानसभा चुनाव तीन चरणों में हुए थे। 2005 में राज्य में दो बार विधानसभा चुनाव हुए थे। पहली बार फरवरी में मतदान हुआ था और किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। राज्य में अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू भाजपा गठबंधन पिछले पंद्रह वर्षो से सत्ता में काबिज लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली राजद को जबर्दस्त शिकस्त देते हुए सत्तारूढ़ हुआ था। आगामी विधानसभा चुनाव में राज्य में सत्तारूढ़ जदयू भाजपा गठबंधन का मुख्य मुकाबला लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के नेतृत्व वाली राजद लोजपा गठबंधन से होगा। लंबे समय से सत्ता से बहार रही कांग्रेस भी इस बार पूरे दमखम से चुनाव मैदान में होगी। पिछले लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी कांग्रेस ने राज्य की सभी सीटों पर अकेले चुनाव लडऩे की घोषणा की है। उधर, वामपंथी पार्टियां माकपा, भाकपा और माकपा माले मिलकर चुनाव लडऩे की तैयारी कर रही हैं। इन दलों के बीच अगले सप्ताह सीटों का तालमेल होने की उम्मीद है। नीतीश कुमार ने मांग की है कि लोग चुनाव की प्रक्रिया में भयमुक्त होकर भाग लें तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संपन्न हो सके इसके लिए शत-प्रतिशत मतदान केंद्रों पर केंद्रीय सशस्त्र बलों की तैनाती की जाए। गौर करने योग्य यह भी है कि अभी भी बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं भाजपा के बीच जो रस्साकशी चल रही है, उसकी जड़ में मुस्लिम वोटों की राजनीति है। जहां एक ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का विवादास्पद विज्ञापन एक रणनीति का हिस्सा था, तो वहीं नीतीश कुमार का बाढ़ पीडि़तों के लिए मोदी द्वारा दी गई 5 करोड़ की राशि लौटाना। बिहार में महादलित का कार्ड चलने के बाद नीतीश अब मुस्लिमों को अपने पाले में खींचना चाहते हैं और यह तभी संभव है जब वह भाजपा के कट्टरपंथी चेहरे पर आघात कर आक्रामक रुख अपनाएं। आजकल वह यही कर रहे हैं। बिहार में दलितों और मुस्लिमों के वोटों की संख्या एक-तिहाई के करीब बैठती है। बिहार में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 39 है। नीतीश की निगाह इसी एक-तिहाई वोट बैंक को हासिल करने की है। बिहार में एक पुरानी कहावत है- यहां लोग वोट डालने नहीं जाते बल्कि जाति के लिए वोट डालते हैं। और इसी के इर्द-गिर्द राजनीति घूमती है। बेशक, इन पांच सालों में विकास कार्य के बल पर नीतिश ने एक नई सोच बनाई है। कुर्मी वोट हालांकि बहुत अधिक नहीं हैं, फिर भी जितने हैं नीतीश के साथ हैं। राज्य में अगड़े वोट बंटे हुए हैं। इस तरह नीतीश इस बार बहुत सोच समझ कर अपनी चाल चल रहे हैं। वह एक नया सामाजिक समीकरण बनाना और उसके बल पर सत्ता में पहुंचना चाहते हैं। बहुत हद तक मुस्लिमों का भरोसा भी एक बड़ा कारण होगा। 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के जदयू ने 139 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसने 20.46 फीसदी वोटों के साथ 88 सीटों पर जीत हासिल की थी। यदि वह इस बार अकेले दम पर सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं तो उन्हें 243 सीटों में से 122 सीटों को जीतना होगा। उत्तर-पूर्वी बिहार के कई इलाकों में नीतीश को भाजपा की दरकार हो सकती है। पूर्णिया, किशनगंज, बेतिया, कटिहार, भागलपुर आदि कई जगहों पर एंटी मुस्लिम फीलिंग ने भाजपा को अपने पैर जमाने में मदद की है। यह ऐसे इलाके हैं जहां भाजपा के साथ रहते नीतीश को मुस्लिम वोट मिलना नामुमकिन है। बिहार में मुस्लिमों के वोट पाने के लिए नीतीश को भाजपा का दामन छोडऩा होगा। बिहार में करीब 60 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक साबित होते हैं। इसी को ध्?यान में रख नीतीश कह रहे हैं कि यदि बिहार में गठबंधन को बचाना है तो भाजपा को नरेंद्र मोदी और वरूण गांधी को बिहार विधानसभा चुनाव से दूर रखना होगा। लेकिन इन इलाकों में यही दो नेता भाजपा के खेवनहार भी बन सकते हैं। गठबंधन पर फैसले को लेकर आज भाजपा के नेता बैठक कर रहे हैं। नीतीश के इस नये समीकरण को गढऩे की राह में मायावती एक बड़ा रोड़ा बन सकती हैं। बसपा ने बीते विधानसभा चुनाव में 4.17 फीसदी वोटों के साथ 4 सीटों पर जीत हासिल की थी। बसपा कितनी सीटें जीतती है, इससे अधिक वह कितनी सीटों पर वोट काटती है, यह बात देखने वाली होगी। राज्सभा के सदस्?य डाक्?टर एजाज अली, जो कि फिलहाल जदयू से निष्?कासित हैं, ने बताया कि बीते लोकसभा चुनाव में जदयू-भाजपा गठबंधन को मुस्लिमों के वोट नहीं मिले थे। राज्?य में मुस्लिम वोटों की संख्?या 16 फीसदी के करीब है। वह कहते हैं कि राज्?य में मुस्लिम वोट एकतरफा पड़ता है। हालांकि बीते चुनाव में यह लालू और पासवान में बंट गया था। वहीं, कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार है। पार्टी महासचिव राहुल गांधी के दौरों को लेकर खासी उत्साहित है। सूबे के हरके हिस्से से राहुल गांधी के कार्यक्रम की मांग हो रही है। प्रदेश अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने भी आलाकमान से मांग की है कि राहुल गांधी के ज्यादा से ज्यादा दौरे प्रदेश में हों। प्रदेश अध्यक्ष ने इस बाबत खुद राहुल से भी संपर्क साधा है। इस बीच कांग्रेस ने अपने प्रचार अभियान में कुछ निजी एजेंसियों का भी सहयोग लेने का मन बनाया है और कुछ एजेंसियों को यह जिम्मेदारी दे दी गई है। बिहार विधानसभा के लिये चुनाव 21 अक्टूबर से 20 नवंबर तक कराए जाएंगे। पहला चरण- 21 अक्टूबर (47 सीटें) दूसरा चरण- 24 अक्टूबर (45 सीटें) तीसरा चरण- 28 अक्टूबर (48 सीटें) चौथा चरण- 01 नवंबर (42 सीटें) पांचवां चरण- 09 नवंबर (35 सीटें) छठा चरण- 20 नवंबर (26 सीटें) वोटों की गिनती 24 नवंबर को होगी मुस्लिमों को लुभाने की कोशिशें तेज एशियन डवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा कराए गए इस सर्वे के मुताबिक बिहार में मुस्लिमों की आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करती है।हालांकि नीतीश कुमार ने राज्य में मुस्लिमों के शैक्षिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए तालीमी मरकज और हुनर का प्रोग्राम आदि कार्यक्रम चलाए और कब्रिस्तान की घेराबंदी के लिए विशेष फंड की व्यवस्था की। बिहार में यह मामला दंगे भड़कने का सबसे बड़ा कारण बनता रहा है। बिहार के मुस्लिमों में माइग्रेशन एक बड़ी समस्या बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों में प्रति 100 मुस्लिम परिवारों में 63 इस समस्या से जूझ रहे हैं। सर्वे में एक और अहम बात यह सामने आई है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा मुस्लिमों के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रमों का भी उन्हें लाभ नहीं मिल पाता। बिहार का मुस्लिम समाज 43 जातियों में बंटा हुआ है। सर्वे में मुस्लिमों को सबसे गरीब समुदाय बताया गया है।सर्वे के मुताबिक 49.5 फीसदी ग्रामीण मुस्लिम परिवार और 44.8 फीसदी शहरी मुस्लिम परिवार गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। 28.04 फीसदी ग्रामीण मुस्लिमों के पास जमीन नहीं है।
Tuesday, September 7, 2010
Thursday, August 26, 2010
हां-ना के बाद हो ही गया हाँ...
आखिरकार संसद में सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज बिल अथवा परमाणु दायित्व विधेयक का संशोधित प्रारूप पारित हो ही गया। काफी राजनीतिक ना-नुकुर के बाद सरकार ने मुख्य विपक्षी दल भाजपा को विश्वास में लेकर इसे पारित करा लिया। जानकारों की रायशुमारी तो यही रही कि इस विधेयक का मसौदा खराब ही नहीं था बल्कि सरकार ने इसे ठीक से पेश भी नहीं किया था। मसौदा तैयार करने के लिए जिन अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने अगर अपना काम बेहतर ढंग से किया होता और कांग्रेस पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी से पहले ही सलाह मशविरा कर लिया होता तो बाद में बदलाव किए गए , उनमें से कई को मूल मसौदे में ही शामिल कर लिया गया होता। अब सरकार एकमात्र यही दावा कर सकती है कि उसने मसौदा तैयार ही ऐसा किया था कि विपक्ष उसमें सुधार करने के बाद समर्थन घोषित कर सके। दरअसल, कुछ समय से लगातार चर्चा में रहे परमाणु दायित्व बिल को कुछ संशोधनों के साथ लोकसभा में पारित कर दिया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने लोकसभा के पटल पर परमाणु दायित्व बिल का मसौदा रखा। सरकार की ओर से इसमें अठारह संशोधन लाए गए, जिन्हें सदन ने मंजूरी दे दी। विधेयक में यह व्यवस्था है कि दुर्घटना की स्थिति में संचालक को प्रभावित लोंगों को 1500 करोड़ रूपए तक का मुआवजा देना होगा। इसमें परमाणु उपकरण आपूर्तिकर्ता को घटिया माल या सेवा देने के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान किया गया है। काबिलेगौर है कि परमाणु दायित्व विधेयक में ताजा संशोधन के तहत किए गए प्रावधानों को किसी दुर्घटना की स्थिति में ऑपरेटर की जवाबदेही कम करने वाला बताया जा रहा है। केबिनेट ने बिल में उस प्रस्ताव को भी शामिल किया था जिसके अंतर्गत रिएक्टर ऑपरेटर क्षतिपूर्ति का दावा तभी कर सकता है जब हादसे को जानबूझकर अंजाम दिया गया हो। बिल के क्लॉज 17 मे संशोधन के मुताबिक परमाणु रिएक्टर में हादसे की क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी न्यूक्लियर ऑपरेटर की होगी और क्षतिपूर्ति का भुगतान नियम 6 के अनुसार ही किया जाएगा। क्षतिपूर्ति भुगतान का अधिकार तीन उपबंधों पर निर्भर होगा। हालांकि अपने स्तर पर सरकार ने परमाणु दायित्व विधेयक में किए गए संशोधन को उचित ठहराने की कोशिश की, जिनकी वजह से सरकार को आलोचना सहनी पड़ी है। लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि सरकार ने विधेयक में बदलावों के लिए अपने दिमाग खुले रखे और किसी भी ठोस सुझाव को स्वीकार करने के लिए तैयार रहेगी। इसी संदर्भ में चव्हाण ने राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली से भी मुलाकात की थी। तब चव्हाण ने कहा था, ''मैं बदलावों को स्वीकार करने को तैयार हूं।ÓÓ उन्होंने कहा कि हम, मूल विधेयक, संसदीय स्थायी समिति द्वारा दिए गए सुझाव या कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए सुधार या किसी उपयुक्त सुधार के बारे में चर्चा करने को तैयार हैं। सरकार अनुच्छेद 17 में किसी भी सुधार के लिए वार्ता करने को तैयार है। दरअसल, अनुच्छेद 17 (बी) का विवादास्पद संशोधन इस बात को स्पष्ट करता है कि किसी परमाणु संयंत्र का परिचालक हर्जाने की मांग तभी कर सकता है, जब आपूर्तिकर्ता या उसके किसी कर्मचारी के कारण इरादतन दुर्घटना हुई हो। विधेयक में आपूर्तिकर्ता के दायित्व वाले अनुच्छेद में बदलावों को लेकर नाराज भाजपा और वाम दलों ने सरकार के 'इरादतनÓ शब्द पर अंदेशा जताया और सप्ताह के अंत में संसद में विचार के लिए रखे जाने पर विधेयक का विरोध करने की धमकी भी दी थी। गौर करने योग्य तथ्य यह भी है कि वाम दलों का कहना था कि दो उपबंधों के बीच शब्द 'एंडÓ का जि़क्र होने से हादसा होने की स्थिति में परमाणु उपकरण के विदेशी आपूर्तिकर्ताओं का दायित्व कुछ कम हो जाता है। वहीं दूसरा विवाद मुआवज़े की राशि को लेकर भी था। पहले इसके लिए विधेयक में संचालक को अधिकतम 500 करोड़ रुपयों का मुआवज़ा देने का प्रावधान था लेकिन भाजपा की आपत्ति के बाद सरकार ने इसे तीन गुना करके 1500 करोड़ रुपए करने को मंज़ूरी दे दी। सरकार की ओर से भरोसा दिलाते हुए कहा गया कि वह समय समय पर इस राशि की समीक्षा करेगी और इस तरह से मुआवज़े की कोई अधिकतम सीमा स्थाई रुप से तय नहीं होगी। काबिलेगौर है कि भारत और अमरीका के बीच हुए असैन्य परमाणु समझौते को लागू करने के लिए इस विधेयक का पारित होना ज़रूरी था। इस विधेयक में किसी परमाणु दुर्घटना की स्थति में मुआवज़ा देने का प्रावधान है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता वासुदेव आचार्या और रामचंद्र डोम, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गुरुदास दासगुप्ता और भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा ने इस विधेयक का विरोध किया था। उनका कहना था कि ये विधेयक से संविधान के अनुच्छेद 21 का उलंघन होगा, जिसके तहत जीने के अधिकार जैसे मौलिक अधिकार आते हैं। साथ ही इस विधेयक से पीडि़तों को मुआवज़े की राशि बढ़ाने के लिए अदालत जाने के अधिकार से भी वंचित होना पड़ेगा। भाजपा के वरिष्ठ सांसद यशवंत सिंहा ने तो यहां तक आरोप लगाया था कि सरकार ये विधेयक अमरीका के दवाब में पास कर रही है। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इसी वर्ष के मार्च महीने में जब इस विधेयक को पेश करने की कोशिश की गई थी तब समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने इसका विरोध किया था, लेकिन इस बार ये दोनों सरकार के साथ दिखाई दिए। अलबत्ता, इस समूचे प्रकरण में विधेयक के मसौदे पर हुई बहस से निश्चित तौर पर बेहतर विधेयक तैयार करने और इस पर राजनीतिक आमसहमति बनाने में मदद मिली है। वाम दलों ने तो तथ्यों पर शुतुरमुर्ग जैसी भाव-भंगिमा अख्तियार कर ली और इस मुद्दे पर मनगढंत तथ्यों को लेकर लच्छेदार भाषण दिया है। यह आरोप कि विधेयक अमेरिका को उपहार है, खरा नहीं उतरता है क्योंकि रूस, फ्रांस, कोरिया और परमाणु ऊर्जा के उपकरणों की आपूर्ति करने वाले देश भी आपूर्तिकर्ताओं को ऐसे संरक्षण की मांग कर चुके हैं और भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग ने खुद ऑपरेटर को संरक्षण की मांग की थी! वाम दलों की विकृत राय इनकी पुरानी पड़ चुकी राजनीति का हिस्सा है, लेकिन भाजपा की निकट दृष्टि और कांग्रेस पार्टी की दोनों पक्षों की हां में हां मिलाने की नीति के कारण एक अच्छी पहल बदनाम में तब्दील हो गई। जी. बालाचंद्रन सहित परमाणु नीति के कई विशेषज्ञों ने तर्क दिया है कि परमाणु ऊर्जा के असैनिक इस्तेमाल के लिए सितंबर 2009 में हस्ताक्षरित भारत-फ्रांस समझौते में भी कहा गया है कि हर पक्षकार को स्थापित अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों के मुताबिक असैनिक परमाणु दायित्व की व्यवस्था करनी चाहिए। यह मोटे तौर पर वही है जो भारत सरकार ने किया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबद्ध संसद की स्थायी समिति के सदस्यों ने जिन संशोधनों का सुझाव दिया था, वे उसी ढर्रे पर हैं जिनकी उम्मीद विशेषज्ञों ने की थी। विधेयक के मसौदे में ऑपरेटर का दायित्व 500 करोड़ रुपये तक सीमित किया गया था, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 1500 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है। ऑपरेटर के दायित्व की बाबत वियना संधि में ऊपरी सीमा तय नहीं की गई है और भारत पेरिस संधि पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता क्योंकि यह केवल आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी )के सदस्यों तक सीमित है। इस तरह से भारत ऑपरेटर का दायित्व किसी भी स्तर पर तय कर सकता है और परमाणु दायित्व पर अंतरराष्ट्रीय परंपरा के मुताबिक चल सकता है।
Posted by सुभाष चन्द्र at 5:08 PM 0 comments
Labels: परमाणु दायित्व विधेयक

