Monday, August 23, 2010

रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामना

Tuesday, August 10, 2010

नज़र मछली की आंख पर

राष्ट्रमंडल खेलों में हुे घोटालों और अधूरी तैयारियों को लेकर चर्चा का बाज़ार काफी समय से गर्मा रहा है पर इस बीच मीडिया और आम लोग उन खिलाडिय़ो को भूल ही गए जिनके कंधों पर पदक लाने की जिम्मेदारी है। खेल अब मात्र कुछ दिनों ही दूर हैं। ऐसे में जानते है उन खिलाडिय़ों और खेलों की तैयारियों की पड़ताल जिनके पदक लाने की संभावना प्रबल है। अब वह दिन लद गए जब भारतीय खिलाडिय़ों के लिए खेल में अच्छे प्रदर्शन का उद्देश्य मात्र रेलवे, सेना, बैंक या किसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में नौकरी पाना ही था। पिछले एक दशक में खिलाडिय़ों की इस मानसिकता में जबरदस्त बदलाव आया है। आज उनके लिए खेल नौकरी पाने का सबब कम और देश के लिए पदक जीतने का सबब ज्यादा बन गया है। अभिनव बिन्द्रा, सुशील कुमार और विजेन्दर सिंह को पिछले ओलंपिक में मिली सफलता के चलते इस बार खिलाडिय़ों में दोगुना उत्साह है और यह उत्साह उनकी तैयारी में भी दिखता है। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के तहत 18 खेलों के 1126 खिलाडिय़ों को देश विदेश के 192 कोच प्रशिक्षण दे रहे है। इस शिविर में राष्ट्रमंडल खेलों की सभी स्पर्धाओं में पदक जीतने की उम्मीद वाले संभावित खिलाडिय़ों की देश और विदेश में ट्रेनिंग का पूरा खर्च सरकार उठा रही है। किन खेलों के खिलाड़ी पदक ला सकते हैं आइये डालते हैं नज़र पदक जीतने की संभावनाओं पर- शूटिंग इस खेल में भारत ने पिछले कुछ सालों में जो कमाल किया है उसी की बदौलत यह खेल पदक बटोरने में मददगार हो सकता है। कोच मार्सेलो ड्रादी, जंग शाह और सनी थॉमस की निगरानी में निशानेबाज कठिन मेहनत कर रहे हैं। खिलाडिय़ों का यह कड़ा अभ्यास और मेहनत इस खेल के जरिए कम से कम 27 पदक लाने के लिए है। अभिनव बिंद्रा, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, समरेश जंग, गगन नारंग, रोजंन सोढ़ी, अंजलि भागवत जैसे अनुभवी खिलाडिय़ों के अलावा कई नए खिलाड़ी भी हैं जिनसे पदक की उम्मीद की जा रही है। कुश्ती पिछले ओलंपिक में विजेन्दर सिंह और सुशील कुमार ने रजत और कांस्य पदक जीतकर इस खेल में पदक जीतने की उम्मीदों को बढ़ा दिया है। इस खेल के लिए पिछले साल के राष्ट्रीय चैंपियनशिप से शीर्ष चार महिला और पुरुष पहलवानों को चुना गया है जिनका प्रशिक्षण शिविर एनआईएस, पटियाला और भारतीय खेल प्राधिकरण केंद्र सोनीपत में आयोजित किया गया है जहां पुरुषों को जगमिंदर और हरगोविंद तथा महिलाओं को पीआर सोंधी प्रशिक्षण दे रहे हैं। वैसे तो राष्ट्रमंडल खेलों में कुश्ती की अधिकांश कैटेगरी में भारत एक प्रबल दावेदार है पर कनाडा और नाइजीरिया के खिलाड़ी कुछ वजन श्रेणियों में भारत को चुनौती दे सकते हैं। इस बार इस खेल के जरिये भारत की झोली में 10 पदक आने की संभावना है। टेबल टेनिस टेबल टेनिस में भारत को मजबूत बनाने के लिए पुणे, पटियाला और अजमेर में नियमित रूप से शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। इटली के मास्मिसो कस्टेनटिनी और साई के कोच भवानी मुखर्जी भारतीय टीम को कोचिंग दे रहे हैं। इस खेल में भारतीय खिलाडिय़ों को सबसे बड़ी चुनौती चाइना मूल के खिलाड़ी दे सकते हैं। ïवैसे संभव है कि इस बार चीन राष्ट्रमंडल खेलों को हिस्सा न हो पर चीनी मूल के खिलाड़ी सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और स्कॉटलैंड जैसी टीमों के लिए खेलकर भारत के लिए चुनौती बन सकते हैं। अचंता शरत कमल और शुभाजीत साहा सहित कई महिला खिलाडिय़ों के बूते कोच और खिलाडिय़ों को उम्मीद है कि इस खेल से भारत 4 या 5 पदक मिल सकते हैं।टेनिसभले ही सानिया मिर्जा ने पाकिस्तानी दुल्हन बनने का फैसला कर लिया हो और भले ही उनकी रैकिंग पिछले काफी समय से लगातर गिर रही है मगर फिर भी उनके पदक जीतने की उम्मीद भारत को अब भी है। कोच जयदीप मुखर्जी, नंदन बल, एनरिको पिपर्नो, अरुण कुमार सिंह और नितिन कीर्तने की निगरानी में सानिया मिर्जा, लिएंडर पेस और महेश भूपति के अलावा सोमदेव और युकी भांबरी जैसे युवा टेनिस सितारों की पदक जीतने उम्मीद है। नए खिलाडिय़ों का जोश और पुराने खिलाडिय़ों के अनुभव से भारत इस खेल में 5 पदक लाने की उम्मीद है। हॉकी हालांकि पिछले कुछ समय से पुरुष हॉकी में भारत का दबदबा कुछ कम हुआ है मगर भारत की महिला हॉकी टीम काफी स्ट्रॉग है जिसके पदक जीतने की प्रबल संभावना है। साथ ही पुरुष टीम के भी अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। इसके लिए कोच जोस ब्रासा खिलाडिय़ों पर काफी मेहनत कर रहे हैं। दूसरी ओर महिला टीम भी कोच एमके कौशिक की निगरानी में जमकर अभ्यास कर रही है। इस खेल से भारत को कम से कम दो पदक लाने की उम्मीद है। एथलेटिक्स कोलकाता, बंगलौर और पटियाला में भारतीय खेल प्राधिकरण भारतीय एथलीटों को जमकर मेहनत करवा रहा हैं। हालांकि इस खेल में पदक के लिए भारत कभी भी बड़ दावेदार नहीं रहा है मगर फिर भी मेजबान होने के नाते इस बार इस खेल के भाग्य में एक बड़े बदलाव के लिए उम्मीद की जा रही है । डिस्कस थ्रो, शॉट पुट, रिले रेस और ट्रिपल जंप के जरिये भारत को 6 से 8 पदक मिलने की उम्मीद है। बैडमिंटन भारतीय बैडमिंटन टीम के राष्ट्रीय कोच गोपी चंद को आशा है कि इस खेल के जरिए उनके खिलाड़ी भारत की झोली में कम से कम तीन पदल ला सकते हैं। इसके लिए खिलाडिय़ों को गोपीचंद और हदी इडरिस अंतरराष्ट्रीय स्तर की कोंचिग दे रहे हैं ताकि भारतीय खिलाड़ी किसी भी मायने में किसी से कमतर साबित न हों। कोच को उम्मीद है कि सायना नेहवाल तो महिला एकल में स्वर्ण जीतेगी ही साथ ही ज्वाला गुटा और वी दीजू के भी डबल्स में पदक लाने की प्रबल संभावना है। भारोत्तोलन भारतीय भारोत्तोलन संघ और इसके खिलाड़ी हमेशा ही विवादों में रहते हैं। कभी घोटालों को लेकर तो कभी डोपिंग के कलंक तले दबे इस खेल के खिलाड़ी एक बार फिर अपनी किस्मत आजमाएंगे। डोपिंग का डंक इस खेल पर इस कदर हावी है कि इसके खिलाडिय़ों से पदक की उम्मीद कम और डोपिंग टेस्ट में पाक साफ साबित होने उम्मीद ज्यादा की जाती है। भारोत्तोलन के राष्ट्रीय कोच हरनाम सिंह को वी एस राव, रवि कुमार, गीता रानी और युमनाम चानू के पदक जीतने की उम्मीद है। तैराकी नामी कोच प्रदीप कुमार और विदेशी देशों में उपलब्ध सुविधाओं के मिलने से तैरीकी के खिलाड़ी इस बार काफी जोश के साथ मैदान में उतरेंगे। वृंदावल खांडे, संदीप सेजवाल, जे अग्निश्वर यूरोप से उच्च स्तर की कोचिंग लेकर लौटे हैं। हो सकता है भारतीय तैराकी टीम के लिए यह राष्ट्रमंडल खेल एक सुनहरा मौका साबित हो जहां वे अपनी प्रतिभा का सफल प्रदर्शन कर सकें। कोच प्रदीप कुमार को भारतीय तैराकों से चार पदक जीतने की आशा है। मुक्केबाज़ी मुक्केबाजी के लिए खिलाडिय़ों को कोच जीएस संधू प्रशिक्षित कर रहे हैं। भारतीय मुक्केबाजी महासंघ को अपने मुक्केबाजों से 3 पदक जीतने की उम्मीद है। भारतीय मुक्केबाज पटियाला में आयोजित मुक्केबाजी शिविर में प्रशिक्षण ले रहे हैं। कोच जीएस संधू खिलाडिय़ों पर जमकर मेहनत कर रहे हैं क्योंकि वह जानते हैं कि भारत पदक के लिए इस खेल को आशा भरी नज़रों से देख रहा है। तीरंदाजी खेल मंत्रालय ने जिन तीरंदाजों का चयन किया है उन्हें कोलकाता में साई के प्रशिक्षण केन्द्र में मशहूर तीरंदाज लिम्बा राम प्रशिक्षण दे रहे हैं। फिलहाल भारतीय तीरंदाजों के नाम कोई विशेष रिकार्ड नहीं है मगर फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है। मंगल सिंह और झानू हसदा से पदक की उम्मीद की जा सकती है। स्क्वैश अब तक इस खेल में भारते ने कोई भी मेडल नहीं जीता है। बावजूद इसके इस खेल से भारत को काफी उम्मीदें हैं। भारतीय स्क्वैश टीम के संभावितों खिलाडिय़ों भारतीय स्क्वैश अकादमी, चेन्नई में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन खिलाडिय़ों को भारतीय कोच सायरस पोंचा और विदेशी कोच सुब्रमण्यम सिंगारवेलो मिलकर प्रशिक्षण दे रहे हैं। संभव है कि इस खेल में पाकिस्तान, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा आदि देश भारत को सीधी टक्कर देंगे। फिर भी युगल के दोनों पुरुषों और महिला मुकाबलों में पदक जीतने की उम्मीद है। सरकार राष्ट्रमंडल खेलों को सफल बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस बार राष्ट्रमंडल खेल भारतीयों को टीम इंडिया के रूप में एक सूत्र में काम करने की चुनौती और मौका दे रहा है। वर्ष 2000 से भारत का खेलों का ग्राफ लगातार ऊंचा उठता जा रहा है। राष्ट्रमंडल खेलों में भारत चौथे और एशियाई खेलों में सातवें स्थान पर पहुंच चुका है। बावजूद इसके अभी भी हमारे कई लूप पाइंट हैं। ज्ञात रहे कि ऑस्ट्रेलिया और पड़ोसी देश पाकिस्तान में खिलाडिय़ों के लिए प्रायोजक होते हैं। पाकिस्तान में तो हर स्क्वैश और हॉकी खिलाड़ी के लिए एक-एक प्रायोजक होता है पर यह सब भारतीय खिलाडिय़ों की किस्मत में नहीं है। हमारे यहां अभी यह स्थिति नहीं बन पाई है, लेकिन अगले कुछ वर्षो में ऐसा होना चाहिए कि क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के शीर्ष खिलाडिय़ों के पास भी अपने-अपने प्रायोजक हों ताकि आगे जाकर खेलों में नया बदलाव आ पाए। तो क्या हुआ कि लगभग सवा अरब के आबादी वाला यह देश ओलम्पिक्स मे सिर्फ तीन मेडल लेकर आता हैं मगर खुशी इस बात की है कि इन पदकों ने उम्मीद जगाई है कि हम अन्य खेलों में भी पदक जीत सकते हैं और हमारे खिलाड़ी इस बार के राष्ट्रमंडल खेल में इसे संभव कर दिखाएंगे।

Wednesday, August 4, 2010

अपने-अपने जिद्द के शिकार

छह दशक से भी अधिक का समय बीत चुका है। भारत-पाकिस्तान के बीच जितने मुद्दों पर मतभेद थे, वे आज भी बरकरार है। साथ में मुद्दों की संख्या में इजाफा ही हुआ है। लेकिन उसका हल नहीं निकल पा रहा है। महज औपचारिकतावश मंत्री और सचिव स्तर की वार्ताओं का आयोजन तो नियमित अंतराल पर होता रहा है, लेकिन नतीजा वह ढाक के तीन पात।
आखिर क्यों? जबाव मिलता है अमेरिका के रूप में। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब से दक्षिण एशियाई देशों में अमेरिकी की दिलचस्पी बढ़ी है, तभी से यह क्षेत्र पहले से अधिक अशांत हो गया है। यह सर्वविदित ही है कि पाकिस्तान के स्थापना काल से ही अमेरिका उसे प्रश्रय देता रहा है और वहां के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप भी। नतीजन, पाकिस्तान अमेरिकी हाथों कठपुतली बन चुका है। अब, भारत के मामले में भी ऐसा ही कहा जा रहा है। ऐसे आरोप लगने शुरू हो गए हैं कि भारत की विदेश व आर्थिक नीतियां अमेरिका प्रभावित हैं। संसद के अंदर और बाहर विपक्ष ऐसे आरोप लगाता रहा है। सरकार की ओर से पुरजोर खंडन के बावजूद आम जनता आश्वस्त नहीं हो पा रही है।
भाजपा प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी कहते हैं 'अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन कह रही हैं कि अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन और तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर पाकिस्तान में हैं, लेकिन इसके बाद भी वह पाकिस्तान को असैन्य सहायता दे रही हैं। आतंकी संगठनों के साथ पाकिस्तान के संबंध के पुख्ता सबूत के बावजूद अमेरिका भारत और पाकिस्तान के साथ समान व्यवहार कर रहा है।Ó रूडी का यह भी कहना है कि अक्टूबर 2008 में असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करते समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि अमेरिका भारत के साथ काम करेगा। 'अब अमेरिका पाकिस्तान की मदद करने में लगा हुआ है। असैन्य परमाणु दायित्व विधेयक अमेरिका के साथ घनिष्ठ रिश्ता बनाए रखने का संप्रग का एक दूसरा प्रयास है और भाजपा सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध करती है। भाजपा का मानना है कि प्रधानमंत्री ने देश की विदेश नीति को गिरवी रख दी है।
दूसरी ओर, दक्षिण एशियाई देशों के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा का मानना है कि जबसे भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांगलादेश, भूटान यानि दक्षिण एशिया के देशो में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ी है इसी के साथ यहां शांति खत्म हुई है। गौरतलब है कि वर्ष 1997 में पैट्रिक ख्रयूज की एक रिर्पोट आयी जिसमें कहा गया की आने वाले समय में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन होगा। यह रिर्पोट काफी चर्चा में रही। रिर्पोट का कहना था कि एशिया के देश अमेरिका की मिलेटरी को कम आंक रहे हैं और अमेरिका के खिलाफ एक आयडिओलॉजी पनप रही हैं। उसी समय डिफेंस मिनिस्टर डोनाल्ड रम्सफील्ड ने कहा कि यूरोप पर उतना ध्यान देने की जरूरत नहीं है जितना की साऊथ एशिया में।
अमेरिकी की यही नीति दिनानुदिन आगे बढ़ती जा रही है। अमेरिका अब देख रहा है कि पाकिस्तान कमजोर हो चुका है। चीन आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। भारत भी उसी राह पर आगे बढ चला है। ऐसे में भारत के साथ दोस्ती गाढी जाए। साथ ही भारत-पाक के रिश्ते में उलझाव को बरकरार रखा जाए। जिससे पाकिस्तान तो अमेरिकापरस्त है ही भारत भी उसकी ओर मुंह ताकता रहे। इस क्षेत्र में जब दो सिपाही हो जाएंगे तो चीन अमेरिकी का कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मï चेलानी के अनुसार, आम तौर पर किसी भी दो पड़ोसी देशों के बीच नियमित तौर पर राजनयिक बातचीत होनी चाहिए, मगर पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान परमाणु बम की आड़ में लगातार भारत के खिलाफ सरहद पार से दहशतगर्दी को बढ़ावा देते रहे हैं। भारत-पाक वार्ता में कुछ भी सामान्य नहीं। अपनी ही नीतियों से अचानक भारत का यू-टर्न, जिसे उचित ही पाकिस्तान ने भारत की कूटनीति का नरम रुख माना। इससे वहां की सेना और खुफिया एजेंसी उत्साहित हुईं। साथ ही भारत सरकार के रुख में बदलाव केंद्र सरकार की इच्छा के बगैर हुआ, जिस लेकर जनता के सवालों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। असल में भारतीय रुख में बदलाव और प्रधानमंत्री के बयान के बाद सीमा पार से आतंकवादियों घुसपैठ की घटना बढ़ी है। अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी घटाए बिना पाकिस्तान वहां अपना सैन्य और राजनीतिक प्रभाव नहीं बढ़ा सकता। इसके बगैर वह अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की रणनीति 'पैसे लो और आगे बढ़ोÓ को एक तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचा सकता। अफगान समाज के लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष तबकों में भारत मजबूत भूमिका निभा रहा है।
इसके अलावा, भारत के निर्णय को देखकर लगता है जैसे वह अमेरिका की अफ-पाक रणनीति की सहायता के लिए लिया गया हो। अमेरिका ने अफगान तालिबान से तालमेल बढ़ाने के सार्वजनिक संकेत देकर यह स्पष्ट किया है कि उसकी पाक सेना और खुफिया तंत्र पर निर्भरता बढ़ी है। अफगान तालिबान के साथ कामयाब बातचीत के लिए अमेरिका सबसे पहले तालिबान को कमजोर करना चाहता है। इसीलिए अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान के मारजाह में चल रही कार्रवाई में आक्रामकता दिख रही है। चूंकि अमेरिका अफगान तालिबान के कमांडरों पर दबाव बनाने और उन्हें वार्ता की मेज पर लाने के लिए पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसियों से सहायता की उम्मीद कर रहा है इसलिए उसने पाकिस्तान को खुश करने के लिए भारत को इस्लामाबाद के साथ वार्ता की मेज पर आने का मशविरा दिया। दुश्मन के साथ बेहतर राजनीतिक सौदेबाजी के लिए अमेरिका की यह शुरू से रणनीति रही है कि पहले दबाव बनाओ फिर बातचीत करो।
चिंता की खास वजह यह भी है पाकिस्तान की मौजूदा हालात का लाभ उठाने की जगह भारत अमेरिका का सहारा ले रहा है। भारत अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के प्रयोग के प्रति भी अनिच्छुक है। पाकिस्तान के साथ वार्ता शुरू करने से पता चलता है कि वह अपने कूटनीतिक दांव का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहता। पाकिस्तान के विरुद्ध भारत न सिर्फ कूटनीतिक कवायद से बच रहा है, बल्कि नतीजे के लिए बाहरी ताकतों की ओर देख रहा है। इनमें अमेरिका से लेकर सऊदी अरब तक शामिल हैं। बाहरी ताकतों के भरोसे रहना भारत के लिए जोखिम भरा रहा है। जहां तक अमेरिका की दक्षिण एशिया संबंधी नीति का सवाल है तो वह शुरू से ही संकीर्ण रही है।
पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रह चुके जी. पार्थसारथी फरमाते हैं कि जब तक दोनों देश के विदेशमंत्री अथवा सचिव यह मिलकर तय नहीं कर लेते कि सारे द्विपक्षीय मुद्दों पर मतभेद कहां हैं, तब तक कोई भी वार्ता सफल नहीं हो सकती। आपसी असहमति की पहचान करके भरोसे की तलाश की जा सकती है। सीधे भरोसा खोजने जाएंगे तो नाउम्मीदी ही हाथ लगेगी। और जाहिरतौर पर इसका लाभ कोई तीसरा देश लेगा।
यह तीसरा देश कोई और नहीं बल्कि अमेरिका है। जो अपने सामरिक और आर्थिक हितों से वशीभूत होकर भारत-पाक संबंधों में दिलचस्पी ले रहा है। जिस प्रकार से बीते दिनों अमेरिकी राष्टï्रपति बाराक ओबामा ने भारत-पाक संबंधों को सुधारने का ठेका चीन को देने का ऐलान किया , यह सीधे-सीधे भारतीय सार्वभोमिकता में दखल है। जानकार मानते हैं कि बाराक ओबामा की भारत पर दादागिरी की हिम्मत एटमी करार के कारण ही पैदा हुई है। यह अधिकार तो संयुक्त राष्ट्र को भी नहीं है कि वह बिना हमारी सहमति के किसी तीसरे देश को बिचौला बनने का अधिकार दे। जिस भारतीय कश्मीर का एक हिस्सा चीन ने हड़प रखा है, उस कश्मीर का विवाद निपटाने के लिए चीन को कहना निश्चित रूप से अमेरिका का भारत विरोधी कदम है। हाल ही में चीन की ओर से कश्मीरी नागरिकों को भारतीय पासपोर्ट की बजाए सादे कागज पर वीजा दिया जाना और अब चीन का कश्मीर में मध्यस्थ बनने की कोशिश भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय साजिश की ओर इशारा करते हैं।

नीलम